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त्वरित पुनरावलोकन सारणी
| मद | विवरण | वर्ष / स्रोत |
|---|---|---|
| राजस्थानी भाषा परिवार | पश्चिमी हिंदी शाखा, भारतीय-आर्य परिवार; शौरसेनी अपभ्रंश से व्युत्पन्न | ग्रियर्सन, भाषाई सर्वेक्षण, 1908 |
| 4 प्रमुख बोलियाँ | मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूँढाड़ी (जयपुरी), हाड़ौती | मानक वर्गीकरण |
| ढूँढाड़ी उप-बोलियाँ (2023 PYQ) | जयपुरी, अजमेरी (टोंकाटी तीसरी किस्म) | RPSC मेन्स 2023 |
| डिंगल | साहित्यिक मारवाड़ी; चारण दरबारी परम्परा; पश्चिमी राजस्थान | शास्त्रीय पदनाम |
| पिंगल | पूर्वी साहित्यिक रूप; ब्रज भाषा-प्रभावित; मेवाड़/जयपुर | शास्त्रीय पदनाम |
| पृथ्वीराज रासो | रचनाकार: चंद बरदाई; 69 खंड; ~16,306 छंद; डिंगल रासो | 12वीं–13वीं शताब्दी |
| कान्हड़दे प्रबंध | रचनाकार: पद्मनाभ; 1455 ई.; सबसे प्रारंभिक दिनांकित पुरानी राजस्थानी आख्यान; विषय: 1311 जालोर घेराबंदी | 1455 ई. |
| वेलि क्रिशन रुक्मिणी री | रचनाकार: राठौड़ पृथ्वीराज (पीथल); लगभग 1610 ई.; "5वाँ वेद / 19वाँ पुराण"; डिंगल वेलि रूप | लगभग 1610 ई. |
| वंश भास्कर | रचनाकार: सूर्यमल्ल मिश्रण; ~20,000 छंद; सबसे लंबा राजस्थानी काव्य; विषय: बूँदी राजवंश | 1842–1868 ई. |
| वीर सतसई | रचनाकार: सूर्यमल्ल मिश्रण; 707 दोहे; ब्रज-राजस्थानी; शौर्य/देशभक्ति विषय | 1850 का दशक |
| हम्मीर महाकाव्य | रचनाकार: नयनचंद्र सूरि (जैन विद्वान); 1301 ई. रणथम्भौर घेराबंदी | प्रारंभिक 15वीं शताब्दी |
| विश्व वल्लभ (2018 PYQ) | रचनाकार: मंडलिक; संस्कृत-राजस्थानी नीतिशास्त्र; मंडोर दरबार; संस्कृत के साथ भाषा का प्रारंभिक उपयोग | प्रारंभिक मध्यकाल |
| मुनहता नैनसी | ख्यात + मारवाड़ रे परगना री विगत; जोधपुर दीवान, जसवंत सिंह I के अधीन; "राजस्थान का अबुल फजल" | 1650–1670 ई. |
| वात (2023 PYQ) | राजस्थानी में गद्य आख्यान; ऐतिहासिक/किंवदंती; मौखिक-वाचन शैली; अंतर्निहित पद्य | शास्त्रीय विधा |
| वचनिका (2023 PYQ) | अर्ध-गद्य, अर्ध-पद्य ऐतिहासिक आख्यान; गद्य = घटनाएँ, पद्य = भावनात्मक चरमोत्कर्ष | शास्त्रीय विधा |
| रासो | वीर महाकाव्य; राजपूत शासक के लिए प्रशस्ति काव्य; वंशावली + युद्ध; चारण परम्परा | शास्त्रीय विधा |
| चारण समुदाय | वंशानुगत दरबारी कवि-इतिहासकार; अर्ध-दैवीय दर्जा; राजपूत वंशावली के संरक्षक | मध्यकालीन संस्था |
| जयपुर, जैसलमेर पांडुलिपि संग्रह | राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर (40,000+ पांडुलिपियाँ); जैसलमेर जैन भंडार (3,000+ ताड़पत्र) | सक्रिय पुरालेखागार |
| रूपायन संस्थान | स्थापना 1960, बोरुंदा (जोधपुर); संस्थापक: विजयदान देथा + कोमल कोठारी; 15,000+ लोकगीत पुरालेखित | 1960, बोरुंदा |
| विजयदान देथा "बिज्जी" | 1926–2013; बातां री फुलवारी (14 खंड, 800+ लोककथाएँ); साहित्य अकादमी पुरस्कार 1974; पद्मश्री 2007 | 20वीं–21वीं शताब्दी |
| कोमल कोठारी | 1929–2004; रूपायन सह-संस्थापक; पद्म भूषण 2004; लोक-संगीतशास्त्री | 20वीं–21वीं शताब्दी |
| कन्हैयालाल सेठिया | 1919–2008; "धरती धोरां री" (1951) — राजस्थानी का समकक्ष राष्ट्रगान | 20वीं शताब्दी |
| राजस्थान साहित्य अकादमी | स्थापना 1958, उदयपुर; मधुमती प्रकाशित करती है; मीरा पुरस्कार प्रदान करती है | 1958 |
| 8वीं अनुसूची माँग | वर्तमान में 22 भाषाएँ सूचीबद्ध; राजस्थानी के 8 करोड़ वक्ता; विधान सभा प्रस्ताव 2003; पाटासकर समिति सिफारिश 2015 | 2003 / 2015 |
| 92वाँ संविधान संशोधन | बोडो, डोगरी, मैथिली, संताली जोड़ी गईं — राजस्थानी बाहर | 2003 |
| राजस्थानी वक्ता कुल | ~8 करोड़ (जनगणना 2011); भारत की छठी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा | जनगणना 2011 |
