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इतिहास

संभावित प्रश्न एवं उत्तर

राजस्थानी भाषा एवं साहित्यिक कृतियाँ

पेपर I · इकाई 1 अनुभाग 14 / 15 0 PYQ 48 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

संभावित प्रश्न एवं उत्तर

राजस्थानी साहित्य के संदर्भ में 'वात' और 'वचनिका' शब्दों की व्याख्या कीजिए।
आदर्श उत्तर (HI): वात राजस्थानी का लघु गद्य आख्यान है जो ऐतिहासिक या किंवदंती घटनाओं पर आधारित होता है; इसमें मौखिक वाचन शैली और अंतर्निहित पद होते हैं जो वंशावली और नैतिक सूक्तियाँ संप्रेषित करते हैं। वचनिका अर्ध-गद्य, अर्ध-पद्य ऐतिहासिक आख्यान है — गद्य घटनाओं का वर्णन करता है, पद्य भावपूर्ण क्षणों को व्यक्त करता है। मुनहता नैनसी की रचनाएँ वचनिका परम्परा का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।


राजस्थान की डिंगल और पिंगल साहित्यिक परम्पराओं में अंतर स्पष्ट कीजिए।
आदर्श उत्तर (HI): डिंगल मारवाड़ी का साहित्यिक रूप है, जिसका प्रयोग पश्चिमी राजस्थान के चारण दरबारी कवि करते थे; इसमें कविता छंद, वीर विषय और रासो, वेलि, वचनिका विधाएँ शामिल हैं। पिंगल पूर्वी राजस्थान की ब्रज भाषा-प्रभावित साहित्यिक परम्परा है, जो मेवाड़ और जयपुर दरबारों में विकसित हुई; इसमें सवैया और छप्पय छंद तथा भक्ति विषय प्रधान हैं।


भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में राजस्थानी भाषा को शामिल किए जाने की माँग क्या है? इसकी वर्तमान स्थिति बताइए।
आदर्श उत्तर (HI): लगभग 8 करोड़ वक्ताओं वाली राजस्थानी भाषा की 8वीं अनुसूची (वर्तमान में 22 भाषाएँ) में शामिल होने की माँग है। राजस्थान विधानसभा ने 2003 में इसके समर्थन में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया। पाटासकर समिति (2015) ने शामिल करने की सिफारिश की किंतु संसद ने अभी तक संशोधन विधेयक पारित नहीं किया है। 2026 तक यह माँग सक्रिय है।


विजयदान देथा "बिज्जी" और राजस्थानी साहित्य में उनके योगदान पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
आदर्श उत्तर (HI): विजयदान देथा (1926–2013) "बिज्जी" आधुनिक राजस्थानी गद्य के सर्वप्रमुख साहित्यकार हैं। उनकी बातां री फुलवारी (14 खंड, 800+ लोक कथाएँ) ग्रामीण समुदायों से संकलित मौखिक आख्यानों को साहित्यिक रूप देती है। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1974) और पद्मश्री (2007) प्राप्त हुए। उनके द्वारा 1958 में स्थापित रूपायन संस्थान, बोरुंदा राजस्थानी लोक परम्परा का प्रमुख संग्रह केंद्र है।


प्रमुख कृतियों और चारण परम्परा के संदर्भ में राजस्थान में डिंगल साहित्य के विकास का विवेचन कीजिए।
आदर्श उत्तर (HI): डिंगल साहित्य, वंशानुगत चारण दरबारी कवियों द्वारा साहित्यिक मारवाड़ी में लिखा गया, 12वीं शताब्दी से राजस्थानी साहित्यिक परम्परा की रीढ़ है।

विकास क्रम:

  1. 12वीं-13वीं शताब्दी: रासो विधा का उद्भव — चंद बरदाई कृत पृथ्वीराज रासो (~16,306 छंद, 69 खंड) पहला प्रमुख डिंगल वीर काव्य है जो पृथ्वीराज III की युद्धगाथाएँ वर्णित करता है।

  2. 15वीं शताब्दी: पद्मनाभ कृत कान्हड़दे प्रबंध (1455 ई.) — सर्वाधिक प्राचीन दिनांकित पुरानी राजस्थानी आख्यान काव्य जो 1311 ई. के जालोर युद्ध का वर्णन करता है।

  3. 16वीं-17वीं शताब्दी (चरमोत्कर्ष): राठौड़ पृथ्वीराज "पीथल" कृत वेलि क्रिशन रुक्मिणी री (लगभग 1610 ई.) — समकालीनों ने इसे "5वाँ वेद और 19वाँ पुराण" कहा। मुनहता नैनसी कृत नैनसी री ख्यात (1650-1670 ई.) — सभी 36 राजपूत वंशों का इतिहास; नैनसी को "राजस्थान का अबुल फजल" कहते हैं।

  4. 19वीं शताब्दी: सूर्यमल मिश्रण कृत वंश भास्कर (~20,000 छंद) — सबसे लंबा राजस्थानी काव्य; बूँदी राजवंश का वृत्तांत।

चारण परम्परा: चारणों को वंशानुगत दरबारी कवि-इतिहासकार का दर्जा था। उनकी अर्ध-दैवीय सामाजिक स्थिति उन्हें प्रतिद्वंद्वी दरबारों के बीच स्वतंत्र विचरण की अनुमति देती थी। राजस्थान राज्य अभिलेखागार में 40,000+ डिंगल पांडुलिपियाँ संरक्षित हैं।

सीमा: राजाश्रय के कारण स्तुतिपरक पूर्वाग्रह ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता को कम करता है।

निष्कर्ष: स्तुतिपरक सीमाओं के बावजूद डिंगल ग्रंथ राजपूताने के मध्यकालीन इतिहास के अपरिहार्य प्राथमिक स्रोत हैं और चारण परम्परा ने एक विशिष्ट साहित्यिक पहचान संरक्षित की है।


राजस्थान के शास्त्रीय साहित्य में चारण साहित्य के महत्त्व की परीक्षा कीजिए।
आदर्श उत्तर (HI): चारण साहित्य, वंशानुगत दरबारी कवियों द्वारा डिंगल (साहित्यिक मारवाड़ी) में रचित, 12वीं शताब्दी से राजस्थानी शास्त्रीय साहित्यिक परम्परा की रीढ़ है।

महत्त्व:

  1. ऐतिहासिक अभिलेख: चारण ख्यातें — विशेषत: मुनहता नैनसी की ख्यात (1650-1670 ई.) — राजपूत वंश इतिहास, युद्ध विवरण और वंशावलियों के प्राथमिक स्रोत हैं। नैनसी को "राजस्थान का अबुल फजल" कहते हैं।

  2. साहित्यिक विकास: चारण कवियों ने रासो, वचनिका, वेलि और बिरुद विधाओं का सृजन और मानकीकरण किया। राठौड़ पृथ्वीराज कृत वेलि क्रिशन रुक्मिणी री (लगभग 1610 ई.) को "5वाँ वेद और 19वाँ पुराण" माना जाता है।

  3. भाषा संरक्षण: डिंगल ग्रंथ पुरानी राजस्थानी की शब्द-संपदा, व्याकरण और शैलीगत परम्पराएँ संरक्षित करते हैं। राजस्थान राज्य अभिलेखागार में 40,000+ पांडुलिपियाँ हैं।

  4. सामाजिक भूमिका: चारणों की अर्ध-दैवीय स्थिति उन्हें प्रतिद्वंद्वी दरबारों में स्वतंत्र आवाजाही की अनुमति देती थी, जिससे वे सांस्कृतिक राजदूत और राजनीतिक स्मृति के संवाहक बने।

  5. सीमा: राजाश्रय के कारण पराजय और विद्रोह का व्यवस्थित अल्पीकरण ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता को बाधित करता है।

निष्कर्ष: स्तुतिपरक सीमाओं के बावजूद चारण साहित्य मध्यकालीन राजस्थान के पुनर्निर्माण के लिए अपरिहार्य है और एक विशिष्ट राजस्थानी साहित्यिक पहचान को संरक्षित करता है।