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आधुनिक राजस्थानी साहित्य एवं 8वीं अनुसूची आंदोलन
आधुनिक साहित्यिक राजस्थानी का संक्रमण
आधुनिक राजस्थानी साहित्य लगभग 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से आरम्भ होता है जब नई प्रिंट मीडिया, औपनिवेशिक शिक्षा और सुधार आंदोलनों ने साहित्यिक उत्पादन को बदल दिया। प्रमुख विकास:
- 1899: राजपूताना गज़ट राजस्थानी भाषा में प्रकाशन आरम्भ करती है
- 1940-50 का दशक: राजस्थानी पत्रिकाएँ उभरती हैं, जिनमें राजस्थानी (जोधपुर) और पर्बतिया शामिल हैं
- 1958: विजयदान देथा और कोमल कोठारी द्वारा बोरुंदा (जोधपुर जिला) में रूपायन संस्थान की स्थापना — राजस्थानी लोक साहित्यिक परम्परा के पुरालेखन और संवर्धन की सबसे महत्त्वपूर्ण संस्थागत पहल
- 1960: राजस्थान सरकार द्वारा उदयपुर में राजस्थान साहित्य अकादमी की स्थापना; पुरस्कारों, प्रकाशनों और पत्रिका मधुमती (1960 में प्रारम्भ) के माध्यम से राजस्थानी साहित्यिक उत्पादन को सक्रिय रूप से बढ़ावा
विजयदान देथा — "बिज्जी"
विजयदान देथा (1926–2013), उपनाम "बिज्जी", आधुनिक राजस्थानी साहित्य के शिखर पुरुष हैं। बोरुंदा (जोधपुर जिला) में जन्मे, उन्होंने लगभग 60 वर्ष ग्रामीण समुदायों से राजस्थानी मौखिक लोककथाएँ संकलित करने और उन्हें आधुनिक साहित्यिक राजस्थानी में रूपांतरित करने में बिताए।
बातां री फुलवारी ("कहानियों का बगीचा") उनकी महान कृति है: 14 खंडों में 800+ राजस्थानी लोककथाओं का संकलन — वात परम्परा में साहित्यिक गद्य में रूपांतरित। यह राजस्थानी लोक आख्यान का सबसे व्यापक संग्रह माना जाता है।
देथा को साहित्य अकादमी पुरस्कार (1974) और पद्मश्री (2007) प्राप्त हुए। हिंदी में कभी न लिखने के बावजूद वे अनुवादों के माध्यम से राष्ट्रीय पाठकों तक पहुँचे।
कोमल कोठारी (1929–2004) देथा के रूपायन परियोजना के साथी थे और राजस्थानी लोक संगीत और मौखिक प्रदर्शन परम्पराओं के सर्वोच्च विशेषज्ञ थे। कोठारी ने राजस्थानी मौखिक साहित्य का सबसे बड़ा संग्रह तैयार किया: 15,000+ लोकगीत रिकॉर्डिंग, 500+ लोक वाद्ययंत्र रिकॉर्डिंग। उन्हें पद्म भूषण (2004, मरणोपरांत) प्राप्त हुआ।
अन्य आधुनिक साहित्यिक व्यक्तित्व
| लेखक | काल | प्रमुख कृतियाँ | योगदान |
|---|---|---|---|
| कन्हैयालाल सेठिया (1919–2008) | 20वीं शताब्दी | धरती धोरां री (1951), लीली पीली हरियो आसमान | आधुनिक राजस्थानी काव्य के जनक; "धरती धोरां री" को राजस्थानी का राष्ट्रगान कहा जाता है |
| नंद भारद्वाज (जन्म 1948) | समकालीन | आगो समुंदो, पूर्ण सत्य | साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता (2010); राजस्थानी में समकालीन कथा और काव्य |
| अर्जुन देव चारण | समकालीन | डिंगल काव्य | चारण काव्य परम्परा का आधुनिक निरंतरता |
8वीं अनुसूची मान्यता माँग
भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाषाएँ सूचीबद्ध हैं, जिनमें बोडो, डोगरी, मैथिली और संताली 92वें संविधान संशोधन, 2003 के माध्यम से जोड़ी गई थीं। राजस्थानी स्पष्ट रूप से अनुपस्थित है।
मान्यता आंदोलन का कालक्रम:
| वर्ष | घटनाक्रम |
|---|---|
| 1947–50 | संविधान सभा में बहस: राजस्थानी पर विचार किया गया लेकिन एकीकरण के बाद की स्थिरता प्रतीक्षा में बाहर रखा गया |
| 1952 | राजस्थानी साहित्यिक संगठनों की पहली औपचारिक माँग |
| 1956 | राज्य पुनर्गठन के बाद: राजस्थान वर्तमान रूप में; माँग तीव्र |
| 2003 | राजस्थान विधानसभा ने 8वीं अनुसूची में शामिल करने के लिए सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया |
| 2003 | 92वाँ संशोधन 4 भाषाएँ जोड़ता है — राजस्थानी बाहर |
| 2015 | पाटासकर समिति (केंद्र सरकार) ने राजस्थानी को लंबित भाषाओं में शामिल करने की सिफारिश की |
| 2024–26 | माँग जारी; संसद में कोई संशोधन विधेयक नहीं लाया गया |
शामिल किए जाने के पक्ष में तर्क:
- 8 करोड़ मातृभाषी (जनगणना 2011) — 8वीं अनुसूची में पहले से शामिल कई भाषाओं से अधिक
- 12वीं शताब्दी से दस्तावेजित समृद्ध साहित्यिक परम्परा
- हिंदी से अलग व्याकरण, स्वर-विज्ञान और शब्द-भंडार
बाधाएँ:
- जनगणना 2011 ने कई राजस्थानी बोली-भाषियों को "हिंदी" वक्ता के रूप में वर्गीकृत किया
- राजनीतिक जटिलता: शामिल करने से उप-बोलिक माँगें उठ सकती हैं
- हिंदी पट्टी की राजनीति: प्रभावशाली हिंदी साहित्यिक प्रतिष्ठान राजस्थानी को हिंदी की बोली मानता है
