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प्रमुख जनजातियाँ: विशेषताएँ एवं परंपराएँ
3A. भील — सबसे बड़ी जनजाति
भील शब्द द्रविड़ शब्द "बिल" से बना है जिसका अर्थ धनुष है — भील परंपरागत रूप से कुशल तीरंदाज के रूप में जाने जाते हैं। ये राजस्थान की सबसे बड़ी जनजाति हैं और भारत की सबसे बड़ी जनजातियों में से एक, जिनकी उपस्थिति गुजरात, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में भी है।
ऐतिहासिक महत्त्व
मध्यकालीन राजपूताना में भीलों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। मेवाड़ राज्य के संस्थापक बप्पा रावल (8वीं शताब्दी ई.) का लालन-पालन भीलों ने किया, ऐसी मान्यता है। मेवाड़ राजघराने में राज्याभिषेक के समय भील के अंगूठे का तिलक (रक्त-तिलक) ग्रहण करने की प्रतीकात्मक परंपरा आज भी बनाए रखी जाती है — यह 20वीं शताब्दी तक जारी रही और राजपूत शासक वर्ग तथा भील वन-स्वामियों के प्राचीन समझौते का प्रतीक है।
सामाजिक संरचना
- पाल प्रणाली: भील गाँवों को पालों (5–30 गाँवों के समूह) में बाँटा जाता है, जिसका प्रशासन वंशानुगत पालिया या पटेल (मुखिया) करता है।
- गोत्र: भील बहिर्विवाही कुल/गोत्र प्रणाली का पालन करते हैं; सामान्य गोत्रों में कटारा, वसुनिया, मैदा, बामनिया शामिल हैं। एक ही गोत्र में विवाह पूर्णतः वर्जित है।
- फालिया: पाल के नीचे की उपइकाई, लगभग एक टोले के समान; फांगी पुरुष परिषद है जो विवादों का निपटारा करती है।
विवाह-रीतियाँ
- दापा प्रथा: वर पक्ष वधू के परिवार को वधू मूल्य देता है — यह दहेज का विपरीत है। राशि (जिसे दापा कहते हैं) वार्ता से तय होती है और सामान्यतः नकद, पशुधन और अनाज शामिल होते हैं।
- नाता प्रथा: द्वितीयक संबंध का सामाजिक रूप से मान्य स्वरूप। यदि विवाहित स्त्री अपने पति को छोड़कर किसी अन्य पुरुष के साथ रहना चाहे, तो नया पुरुष पहले पति को "नाता मूल्य" चुकाता है। यह व्यवस्था सामुदायिक सभा में घोषित की जाती है; नाता संबंध से उत्पन्न संतान वैध मानी जाती है। इस प्रथा पर कानूनी जाँच होती रही है, किंतु यह सामाजिक रूप से प्रचलित है।
- हल्दी-तेल समारोह: विवाह-पूर्व हल्दी-तेल लगाने की रस्म, जिसके बाद पिथोड़ी (महिलाओं के गीत) होते हैं।
अर्थव्यवस्था और जीविका
भील अर्थव्यवस्था मुख्यतः वन-आधारित है। प्रमुख गतिविधियाँ:
- महुआ फूलों का संग्रह (जिससे महुआ दारू बनाई जाती है)
- तेंदू पत्ते और बाँस का संग्रह
- पहाड़ी आगेर (सीढ़ीदार) खेतों पर सहायक कृषि (मक्का, उड़द, मूँगफली)
वन आरक्षण नीतियों ने पारंपरिक वन-आधारित अर्थव्यवस्था को बाधित किया है — यह वन-अलगाव और असंतोष का प्राथमिक स्रोत है। संवैधानिक प्रावधानों के लिए धारा 6 देखें।
धार्मिक आस्थाएँ
भील स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा करते हैं:
- काली बाई — एक लोक देवी, 1947 के स्वतंत्रता संघर्ष में शहीद; डूँगरपुर की प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी
- घोटिया बाबा — रक्षक देवता
- पूर्वजों की आत्माएँ (पितु)
भगोरिया उत्सव (राजस्थान-मध्यप्रदेश सीमा पर प्रचलित) में युवा भील बाज़ार में परस्पर सहमति से जीवन-साथी चुनते हैं। होली उत्सव भव्य होता है — भील भगोरिया परंपराओं के साथ होली कई दिनों तक मनाते हैं।
गवरी — महान लोकनाट्य
गवरी, जिसे राई या गौरी भी कहते हैं, उदयपुर, राजसमंद और भीलवाड़ा जिलों में विशेष रूप से भील समुदाय द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। प्रदर्शन चक्र रक्षा बंधन के 2–3 दिन बाद शुरू होकर 40 लगातार दिनों (अगस्त–सितंबर) तक चलता है।
गवरी की प्रमुख विशेषताएँ:
- केवल पुरुष अभिनेता; 40 दिनों के चक्र में कलाकार अनुष्ठानिक पवित्रता बनाए रखते हैं (कोई चमड़ा नहीं, मछली नहीं, शराब नहीं)
- केंद्रीय पात्र: पुरिया (शिव का प्रतिनिधित्व) और राई (पार्वती का स्त्री-वेशधारी)
- प्रसंगों में शिव-पार्वती पौराणिक कथाएँ, भूरा-बावसी राक्षस आख्यान और स्थानीय लोककथाएँ शामिल हैं
- प्रदर्शन भ्रमणशील है — दल 40 दिनों में गाँव-गाँव घूमता है
- UNESCO अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में विचार के लिए प्रस्तुत; राजस्थान संगीत नाटक अकादमी पुनरुद्धार कार्यक्रम चला रही है
3B. मीणा (मिना) — पूर्व की जनजाति
मीणा राजस्थान की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है और पूर्वी राजस्थान की प्रमुख जनजाति है। नाम संस्कृत मत्स्य (मछली) से व्युत्पन्न है — मीणा मछली को टोटम चिह्न मानते हैं और मत्स्य भगवान (विष्णु के मत्स्य अवतार) से अपनी उत्पत्ति बताते हैं। उनका ऐतिहासिक क्षेत्र वर्तमान भरतपुर, अलवर और जयपुर के आसपास का मत्स्य प्रदेश था।
ऐतिहासिक महत्त्व
- राजपूत-पूर्व काल: मीणाओं ने पूर्वी राजस्थान के विशाल हिस्से पर नियंत्रण रखा। जयपुर, अलवर और सीकर जिलों में -वाली, -पुर या -वाड़ा प्रत्यय वाले कई स्थान-नाम प्राचीन मीणा बस्तियों से जुड़े हैं।
- जय सिंह II के भूमि अभिलेख (18वीं शताब्दी) ढूँढाड़ क्षेत्र में मीणा जमींदारों (भूमि-स्वामियों) का विवरण देते हैं।
- ब्रिटिश शासन में मीणाओं को आपराधिक जनजाति अधिनियम 1871 के अंतर्गत सूचीबद्ध किया गया था — यह अपमानजनक औपनिवेशिक वर्गीकरण आपराधिक जनजाति (निरसन) अधिनियम 1952 द्वारा समाप्त किया गया।
सामाजिक संगठन
- गोत्र और बहिर्विवाह: मीणाओं के 24 गोत्र हैं जो दो वर्गों में बँटे हैं — जमींदार मीणा (भूमिधारी) और चौकीदार मीणा (पहरेदार)।
- परिषद प्रणाली: मीणा महासभा (स्थापना 1944) एक सामाजिक सुधार संगठन के रूप में बाल विवाह, उपसमूहों में जाति भेदभाव की समाप्ति और शिक्षा प्रसार के लिए कार्य करती है।
रीति-रिवाज
- नाता प्रथा मीणाओं में भी भीलों के समान प्रचलित है।
- मृत्यु संस्कार: मीणाओं में परंपरागत रूप से दोनों — दफन और दाह संस्कार — प्रचलित थे; अब दाह संस्कार अधिक सामान्य है। पचेला रस्म (मृत्यु के 13वें दिन, सामुदायिक भोज) अभी भी जारी है।
- होली और गणगौर प्रमुख त्योहार हैं; मीणा महिलाएँ विशिष्ट लोकगीतों (गीत) के साथ गणगौर व्रत मनाती हैं।
3C. गरासिया — पहाड़ी जनजाति
गरासिया (कभी-कभी गरासिया-राजपूत या गिरासिया भी कहे जाते हैं) अरावली में जनजातीय आबादी से वैवाहिक संबंध बनाने वाले राजपूत कुलों के वंशज हैं। नाम गरास (भूमि-अनुदान) से बना है, जो उनकी ऐतिहासिक स्थिति छोटे भूमिधारियों के रूप में इंगित करता है। जनगणना 2011 में राजस्थान में लगभग 3.09 लाख गरासिया गिने गए, जो मुख्यतः सिरोही (आबू रोड, पिंडवाड़ा), पाली और उदयपुर जिलों में केंद्रित हैं।
अनोखी विवाह परंपराएँ
| प्रथा | विवरण |
|---|---|
| छोड़ प्रथा | एक स्त्री अपना पति छोड़ सकती है; औपचारिक तलाक की आवश्यकता नहीं; वह अपने बच्चों को अपने पास रख सकती है |
| मोरम प्रथा | परीक्षण विवाह — औपचारिक विवाह से पहले दंपती एक परीक्षण अवधि तक साथ रहते हैं |
| पैठ विवाह | भागकर किया गया विवाह जिसे बाद में समुदाय की मान्यता मिलती है |
| ताना विवाह | विनिमय विवाह — दो परिवार आपस में वधुओं का आदान-प्रदान करते हैं |
टिप्पणी: ये प्रथाएँ गरासिया महिलाओं को मुख्यधारा की तुलना में असामान्य सामाजिक स्वायत्तता देती हैं।
अर्थव्यवस्था और धर्म
अर्थव्यवस्था: वन उपज (गोंद, राल, लकड़ी), पशुपालन (मवेशी, भेड़), वर्षा-आधारित कृषि। गरासिया अरावली पहाड़ी क्षेत्रों में पारंपरिक गरास (चराई अधिकार) रखते हैं।
धार्मिक आचरण: गरासिया धर्म हिंदू तत्त्वों (शिव, दुर्गा पूजा) और जीवात्मवाद का मिश्रण है। पूर्वजों की आत्माओं (पितार) को घरेलू मंदिरों में तर्पण दिया जाता है। गोवारी नृत्य (त्योहारों पर किया जाता है) और मांच (रात्रिकालीन गायन सत्र) विशिष्ट सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ हैं।
2023 PYQ प्रासंगिकता: RPSC मुख्य परीक्षा 2023 के प्रश्न में सीधे "गरासिया जनजाति का सामाजिक-आर्थिक प्रोफाइल" पूछा गया था — आदर्श उत्तर रूपरेखा अनुभाग में टेम्पलेट उत्तर देखें।
3D. सहरिया — PVTG
सहरिया (सेहरिया भी) को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में वर्गीकृत किया गया है — राजस्थान का एकमात्र PVTG। ये बारां जिले (शाहबाद और किशनगंज तहसील) में विंध्य पहाड़ियों और चंबल मैदानों के बीच के संक्रमण क्षेत्र में बसे हैं; कोटा और झालावाड़ में भी कुछ जनसंख्या है।
सामाजिक-आर्थिक प्रोफाइल
- जनसंख्या: लगभग 1.07 लाख (जनगणना 2011), बहुत धीमी वृद्धि दर के साथ
- साक्षरता: ~37% (2011), राजस्थान के प्रमुख जनजातीय समूहों में सबसे कम
- पारंपरिक व्यवसाय: वन संग्रहण (साहरी बेरी — वन-शिविर निवास), शहद संग्रह, महुआ, आचार/भिलावा फल, बीड़ी पत्तियों का संग्रह
- भूमि-स्वामित्व: अत्यंत कम; अधिकांश भूमिहीन हैं या सीमांत जोत हैं
- आवास: पारंपरिक साहरी (वन-बस्ती) बिखरी झोपड़ियों की; अब आंशिक रूप से राजस्व गाँवों में बस गए हैं
कल्याण संबंधी चुनौतियाँ
2002–03 के सहरिया अकाल मौतों ने बारां में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की विफलता को उजागर किया जो पृथक PVTG बस्तियों तक नहीं पहुँच सकी। इसके परिणामस्वरूप केंद्र सरकार ने सहरिया विकास कार्यक्रम शुरू किया जिसमें शामिल थे:
- बढ़ा हुआ प्रति व्यक्ति TSP व्यय
- आँगनवाड़ी का गहन विस्तार
- महुआ संग्रहण के लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण
3E. डामोर और कथोड़ी
डामोर: लगभग 1.10 लाख व्यक्ति (जनगणना 2011), डूँगरपुर और बाँसवाड़ा में केंद्रित। ये राजस्थानी-गुजराती मिश्रित बोली बोलते हैं। समुदाय में दापा (वधू मूल्य) और पारंपरिक नृत्य शैलियाँ प्रचलित हैं।
कथोड़ी: उदयपुर और सिरोही में छोटा जनजातीय समूह (~45,000)। परंपरागत रूप से टोकरी-बुनकर और खैर वृक्षों से कत्था (catechu) निकालने वाले। अत्यधिक गतिशील, भूमि-स्वामित्व बहुत कम और कुपोषण का बोझ अधिक।
