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इतिहास

आदर्श उत्तर रूपरेखा

मेले एवं त्योहार

पेपर I · इकाई 1 अनुभाग 10 / 14 0 PYQ 43 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

आदर्श उत्तर रूपरेखा

5 अंक उत्तर रूपरेखा A (50 शब्द)

प्रश्न: बेणेश्वर मेला क्या है? राजस्थान की जनजातीय समुदायों के लिए इसका महत्त्व बताइए।

आदर्श उत्तर:

बेणेश्वर मेला राजस्थान का सबसे बड़ा जनजातीय मेला है, जो डूँगरपुर जिले में माही-सोम-जाखम नदियों के संगम पर माघ पूर्णिमा को आयोजित होता है। "आदिवासियों का कुम्भ" कहलाने वाले इस मेले में प्रतिवर्ष 4–5 लाख भील और गरासिया जनजाति के लोग आते हैं। श्रद्धालु त्रिवेणी संगम में स्नान करते हैं और पूर्वजों की अस्थियाँ विसर्जित करते हैं, जिससे जनजातीय एकता और भील संत-कवि माँवजी महाराज की जीवंत परम्परा सुदृढ़ होती है।

शब्द बजट: परिभाषा + स्थान (15) + "कुम्भ" उपाधि + उपस्थिति (15) + अनुष्ठान वर्णन (12) + सांस्कृतिक महत्त्व (8) = लगभग 50 शब्द


5 अंक उत्तर रूपरेखा B (50 शब्द)

प्रश्न: गणगौर को राजस्थान के लिए अनन्य क्यों माना जाता है? इसके अनुष्ठानों का वर्णन करें।

आदर्श उत्तर:

गणगौर (गण = शिव, गौर = पार्वती) होली से चैत्र शुक्ल तृतीया तक 18 दिनों का महिला पर्व है — इतनी अवधि और इस स्वरूप में यह केवल राजस्थान में ही मनाया जाता है। महिलाएँ प्रतिदिन दूब घास और फूलों के साथ ईसर और गणगौर की मिट्टी की मूर्तियों की पूजा करती हैं और गणगौर गीत गाती हैं। राजपूत शासकों द्वारा स्थापित जयपुर के सिटी पैलेस की शोभायात्रा राज्य का प्रमुख धरोहर आयोजन है।

शब्द बजट: व्युत्पत्ति + विशिष्टता (15) + अवधि + कैलेंडर (12) + अनुष्ठान विवरण (13) + जयपुर सन्दर्भ (10) = लगभग 50 शब्द


10 अंक उत्तर रूपरेखा (150 शब्द)

प्रश्न: राजस्थान के प्रमुख मेलों का वर्गीकरण करें और उनके सांस्कृतिक और आर्थिक महत्त्व की विवेचना करें।

आदर्श उत्तर:

भूमिका: राजस्थान के 1,000 से अधिक वार्षिक मेलों को चार प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है: धार्मिक, जनजातीय, पशु/पशुधन, और मौसमी — प्रत्येक के अपने विशिष्ट सांस्कृतिक और आर्थिक कार्य हैं।

मुख्य बिन्दु:

  1. धार्मिक मेले (कैला देवी, रामदेवरा, गोगामेड़ी) तीर्थ केन्द्रों के रूप में कार्य करते हैं; कैला देवी मेले में प्रतिवर्ष 15–20 लाख तीर्थयात्री आते हैं; रामदेवरा का हिन्दू-मुस्लिम सम्मिश्र चरित्र राजस्थान की समन्वयात्मक विरासत को प्रतिबिम्बित करता है।

  2. जनजातीय मेले (बेणेश्वर, सीताबाड़ी, गौतमेश्वर) भील और सहरिया समुदायों के लिए वार्षिक कुम्भ के समतुल्य हैं, जो हाड़ौती-वागड़ पट्टी में जनजातीय पहचान, मौखिक परम्पराओं और पितृ-अनुष्ठानों को जीवंत रखते हैं।

  3. पशु मेले (पुष्कर, नागौर, तिलवाड़ा) कृषि-पशुचारण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं: नागौर में 70,000–80,000 पशुओं का ₹60–80 करोड़ का व्यापार होता है; पुष्कर में कुल ₹300–400 करोड़ की आर्थिक गतिविधि होती है।

  4. मौसमी उत्सव (गणगौर, तीज, मकर संक्रांति) महिलाओं की मौखिक परम्पराओं, कृषि कैलेंडर और शिल्पकार आजीविकाओं (पतंग उद्योग: राष्ट्रीय स्तर पर ₹500 करोड़ से अधिक) को संरक्षित करते हैं।

निष्कर्ष: मेले और उत्सव राजस्थान के जीवंत संग्रहालय हैं — जो एक साथ पशुचारण अर्थव्यवस्था, जनजातीय पहचान, सम्मिश्र धार्मिक संस्कृति और हस्तशिल्प परम्पराओं को संजो रहे हैं।

शब्द गणना: लगभग 155 शब्द (स्वीकार्य सीमा के भीतर)