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लोक संगीत शैलियाँ एवं परम्पराएँ
माण्ड
माण्ड राजस्थान की विशिष्ट अर्ध-शास्त्रीय लोक-राग शैली है — एक सीमावर्ती विधा जो हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की रागात्मक संरचना का उपयोग करती है किन्तु अपने विषय, बोल और भावनात्मक स्वर राजस्थानी लोक काव्य से लेती है। माण्ड मुख्यतः जयपुर और बीकानेर से सम्बद्ध है और माण्ड गायिका परम्परा की प्रशिक्षित महिला गायिकाओं द्वारा प्रस्तुत की जाती है।
माण्ड की विशेषताएँ:
- राग भैरवी आधार पर राजस्थानी लयात्मक मुहावरे के अलंकारिक मोड़ों का प्रयोग
- विरह, शृंगार (प्रेम-आकुलता) और ऋतु-चक्र से लिए गए विषय
- रचित पद (बन्दिश) के साथ एकान्तर मुक्त-लय खण्ड (आलाप-शैली)
सर्वाधिक प्रसिद्ध माण्ड रचना है "केसरिया बालम, आओ नी पधारो म्हारे देस" — राजस्थान के स्वागत का गीत जो राज्य के सांस्कृतिक हस्ताक्षर का काम करता है। अन्य प्रतिष्ठित माण्ड गीतों में "पनिहारी" (पानी भरने वाली का विलाप) और "रामदेवजी थलावा" (भक्ति गीत) शामिल हैं।
प्रतिष्ठित माण्ड कलाकार और उनकी मान्यता:
- गवरी देवी (बीकानेर): पद्म श्री 1982; 20वीं शताब्दी में माण्ड परम्परा की आधारस्तम्भ मानी जाती हैं
- अल्ला जिलाई बाई (बीकानेर): संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 1961; पहले रिकॉर्ड किए गए माण्ड प्रदर्शन का श्रेय
- सीमा मिश्रा (उदयपुर): समकालीन माण्ड पुनरुद्धार कलाकार; अन्तर्राष्ट्रीय समूहों के साथ सहयोग
लंगा और मँगनियार परम्पराएँ
लंगा और मँगनियार समुदाय राजस्थान की सर्वाधिक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध लोक संगीत परम्पराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये बाड़मेर, जैसलमेर और बीकानेर के थार मरुस्थल क्षेत्र में बसे हैं।
लंगा समुदाय: मुस्लिम वंशानुगत संगीतकार, परम्परागत रूप से सिन्धी-मुस्लिम पशुचर समुदायों द्वारा संरक्षित। बाड़मेर जिले में लगभग 300–400 सक्रिय लंगा परिवार हैं। उनके वाद्य और भण्डार:
- वाद्य: सिन्धी सारंगी, खरताल (लकड़ी के खटकने वाले वाद्य), और सुरण्डो (एक छोटा धनुषवाद्य)
- भण्डार: सोहर (जन्म गीत), सेहरा (विवाह गीत), मरसिया (शोक गीत), और मौसमी कृषि-चक्र गीत
मँगनियार समुदाय: मुस्लिम, ऐतिहासिक रूप से हिन्दू राजपूत और बिश्नोई भू-स्वामियों द्वारा संरक्षित — भारत में अद्वितीय अन्तर-धार्मिक संरक्षण सम्बन्ध। बाड़मेर और जैसलमेर जिलों में लगभग 500–600 मँगनियार परिवार हैं। उनके वाद्य और शैली:
- वाद्य: कमायचा, ढोलक, खरताल, और मोरचंग
- स्वर शैली: भारी अलंकरण (गमक) और पेन्टाटोनिक-स्केल रागात्मक आधार
- भण्डार: हिन्दू भक्ति गीत (रामदेवजी के भजन), राजपूत दरबार के प्रशंसा गीत (फाग, होली), और मौसमी लोक गीत
दोनों समुदायों को 2007 से मेहरानगढ़ दुर्ग, जोधपुर में प्रतिवर्ष आयोजित राजस्थान इंटरनेशनल फोक फेस्टिवल (RIFF) के माध्यम से अन्तर्राष्ट्रीय पहचान मिली। यह महोत्सव 20,000–25,000 अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करता है और पहले अज्ञात मँगनियार व लंगा संगीतकारों के लिए रिकॉर्डिंग अनुबन्ध, अन्तर्राष्ट्रीय दौरे और मान्यता का माध्यम बना है।
प्रमुख कलाकार:
- मामे खान (मँगनियार, जैसलमेर): Coke Studio और अन्तर्राष्ट्रीय संगीत समारोहों में प्रदर्शन; राजस्थान संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2019
- लखा खान (लंगा, बाड़मेर): पद्म श्री 2012; सिन्धी सारंगी के उस्ताद; 50+ अन्तर्राष्ट्रीय दौरे
- घेवर खान (मँगनियार): संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार; BBC World Service के लिए पहली मँगनियार रिकॉर्डिंग का श्रेय
पाबूजी की फड़
पाबूजी की फड़ एक अनूठी प्रदर्शन विधा है जो मौखिक महाकाव्य कविता को पट-चित्रकारी के साथ जोड़ती है। फड़ एक बड़ा कपड़े का पट होता है (सामान्यतः 15–30 फुट लम्बा) जिस पर जोशी समुदाय (भीलवाड़ा) के कलाकार पाबूजी के जीवन के दृश्य चित्रित करते हैं।
प्रदर्शन का प्रारूप:
- भोपा (पुरुष गायक-पुजारी) और भोपी (दीपक थामने वाली महिला) रात भर खुली फड़ के पास प्रदर्शन करते हैं
- भोपी तेल के दीपक से प्रत्येक चित्रित दृश्य को प्रकाशित करती है जब भोपा उस प्रसंग का वाचन करता है
- प्रयुक्त वाद्ययंत्र रावणहत्था है
कथा में पाबूजी के शौर्य कार्य, देवल की ऊँटनियों की रक्षा की प्रतिज्ञा की पूर्ति और युद्ध में उनकी मृत्यु शामिल है — ये सभी तत्त्व उन्हें एक रक्षक देवता के रूप में स्थापित करते हैं। यह प्रदर्शन परम्परा पूर्वी राजस्थान (अजमेर, भीलवाड़ा, नागौर, जोधपुर क्षेत्र) में कम से कम 700 वर्षों से चली आ रही है।
श्रीरूपा जोशी और उनका परिवार (भीलवाड़ा) राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त अन्तिम वंशानुगत फड़ चित्रकार हैं; उन्हें 2010 में UNESCO हस्तशिल्प उत्कृष्टता पुरस्कार मिला।
