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राजस्थान के लोक नृत्य
राजस्थान में 27 प्रलेखित शास्त्रीय एवं लोक नृत्य रूप हैं। निम्नलिखित RPSC द्वारा सर्वाधिक बार परीक्षित किए जाते हैं।
घूमर
घूमर राजस्थान का राजकीय लोक नृत्य है, जिसे महिलाएँ समूह में शुभ अवसरों — त्योहारों, विवाहों और धार्मिक समारोहों — पर प्रस्तुत करती हैं। इसकी परिभाषित गति है घूमना: एक पूर्ण-शरीर चक्कर जिसमें नृत्यांगना की ओढ़नी (दुपट्टा) वृत्त बनाते हुए फैलती है। घूमर की उत्पत्ति भील समुदाय में हुई किन्तु यह सभी जातियों में फैल गया और पूरे राजस्थान का उत्सव-नृत्य बन गया।
विशेषताएँ:
- वृत्ताकार संरचना (घूमरा) में प्रस्तुत; नृत्यांगनाएँ पहले दक्षिणावर्त, फिर वामावर्त घूमती हैं
- वेशभूषा: लम्बा फैला घागरा (स्कर्ट, सामान्यतः बाँधनी) + कंचली (चोली) + ओढ़नी (दुपट्टा)
- संगीत संगत: ढोल, शहनाई, हारमोनियम, और महिलाओं का समूह-गान (घूमर गीत)
- अवधि: परम्परागत प्रदर्शन कई घण्टे; प्रतिस्पर्धी/महोत्सव संस्करण 10–15 मिनट
राजस्थान सरकार ने 2023 में घूमर को आधिकारिक रूप से राजकीय नृत्य घोषित किया, जिससे राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के माध्यम से संस्थागत प्रोत्साहन और वित्त पोषण का अधिकार प्राप्त हुआ। राजस्थान घूमर महोत्सव 2025 (देखें समसामयिकी अनुभाग) राजस्थान के इतिहास में सरकार द्वारा आयोजित सबसे बड़ा लोक नृत्य आयोजन था।
कालबेलिया
कालबेलिया विशेष रूप से कालबेलिया (सपेरा) समुदाय की महिलाओं द्वारा प्रस्तुत किया जाता है — राजस्थान के वंशानुगत साँप पकड़ने वाले, जो मुख्यतः पाली, अजमेर, चित्तौड़गढ़ और सवाई माधोपुर जिलों में बसे हैं। यह नृत्य साँप की वक्र गति की नकल करता है।
UNESCO अंकन: 2010, मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची — देवनारायण फड़ (2013) के बाद अंकित दूसरी राजस्थानी परम्परा।
कालबेलिया की विशेषताएँ:
- वेशभूषा: भारी चाँदी की कढ़ाई और शीशे के काम (साँप की खाल की प्रतीक) वाली काली घागरा-चोली
- कलाबाजी के साथ जमीन के निकट चक्कर; नागिन की गति की अनुकृति में पीछे झुकना और शरीर लहराना
- बीन (पुँगी/बिन — साँप-चर्मकारों का परम्परागत दोहरे-ईख वाला वायु-वाद्य) और ढोलक की संगत
- समुदाय के पुरुष वाद्ययंत्र बजाते हैं जबकि महिलाएँ नृत्य करती हैं
प्रसिद्ध कालबेलिया कलाकार:
- गुलाबो सपेरा: पद्म श्री 2016; कालबेलिया को सड़क-प्रदर्शन से संगीत-सभागार तक पहुँचाने का श्रेय; Kennedy Center (वाशिंगटन डी.सी.), Sadler's Wells (लन्दन) और 45+ देशों में प्रदर्शन
गैर
गैर भील समुदाय के पुरुषों (बाँसवाड़ा, डूँगरपुर, बाड़मेर) द्वारा होली पर्व पर किया जाने वाला समूह-वृत्त नृत्य है। प्रस्तुतकर्ता सजी हुई डण्डियाँ (गैरिया) लेकर विस्तृत और संकुचित होते वृत्तों में नाचते हुए एक-दूसरे की डण्डियाँ लयबद्ध तरीके से टकराते हैं।
दो विशिष्ट रूप हैं:
- भील गैर (बाँसवाड़ा-डूँगरपुर): अधिक आदिवासी स्वरूप, घुँघरुओं के साथ; होली पर 3–5 दिन तक विशेष रूप से प्रस्तुत; नृत्य-वृत्त में 200–300 प्रतिभागी हो सकते हैं
- मारवाड़ गैर (बाड़मेर-जैसलमेर): गैर-आदिवासी समुदायों द्वारा रूपान्तरित; महिलाएँ एक पृथक समकेन्द्रित आन्तरिक वृत्त में भाग लेती हैं; मेलों और लोक महोत्सवों में भी प्रस्तुत
भवाई
भवाई उदयपुर और डूँगरपुर क्षेत्र के भवाई (जोगी) समुदाय की महिलाओं द्वारा प्रस्तुत एक कलाबाजी-सन्तुलन नृत्य है। नृत्यांगना सिर पर बढ़ती संख्या में पीतल या मिट्टी के घड़े (8–10 तक) सँभालती हुई धातु की प्लेट के किनारे पर नाचती है, काँच के टुकड़ों पर चलती है, या एक साथ तलवारें थामती है।
भवाई को लोक नृत्य और सड़क-प्रदर्शन कला दोनों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। यह असाधारण प्रोप्रियोसेप्टिव नियंत्रण प्रदर्शित करता है — शीर्ष भवाई कलाकार आवश्यक सन्तुलन प्राप्त करने के लिए 5–8 वर्ष प्रशिक्षण लेते हैं। 2023 तक राजस्थान में 50 से कम सक्रिय भवाई कलाकार शेष थे — परम्परा विलुप्तप्राय दबाव में है।
तेरहताली
तेरहताली नागौर और पाली जिलों के कामड़ समुदाय की महिलाओं द्वारा विशेष रूप से प्रस्तुत की जाती है। कलाकार पालथी मारकर बैठती है और शरीर पर 13 मंजीरे (पीतल की झाँझ) बाँधती है: 9 दाएँ घुटने पर, 2 बाएँ घुटने पर, और 1-1 प्रत्येक कलाई पर। रामदेव बाबा के भक्ति गीत गाते हुए वह हाथों और कलाइयों से जटिल लयबद्ध प्रतिरूपों में मंजीरों को एक-दूसरे से टकराती है।
यह प्रदर्शन राजस्थान भर के रामदेव मन्दिरों में मन्नत (देवोत्सर्ग) के रूप में भी चढ़ाया जाता है। तेरहताली का रुणिचा मेला (जैसलमेर, भाद्र शुद्ध द्वितीया) से गहरा सम्बन्ध है, जहाँ कामड़ महिलाएँ रामदेवजी मन्दिर के समक्ष 5-दिवसीय महोत्सव में निरन्तर प्रदर्शन करती हैं।
चरी नृत्य
किशनगढ़ (अजमेर जिला) के गुज्जर समुदाय के लिए विशिष्ट, चरी नृत्य महिलाओं की प्रतिदिन पानी लाने की प्रथा को चित्रित करता है। कलाकार सिर पर चारी (जलती तेल-बाती वाले मिट्टी के घड़े) सँभालते हुए नाचती हैं — पहले एक घड़े से, फिर 5–7 जलते घड़ों की मीनार तक। यह नृत्य विवाहों, त्योहारों और प्रतिस्पर्धी लोक-कला आयोजनों में प्रस्तुत किया जाता है।
अग्नि नृत्य
अग्नि नृत्य बीकानेर के जसनाथी सिद्ध समुदाय द्वारा वार्षिक जसनाथ मेले में कतरियासर और पंचाला गाँवों में किया जाने वाला अनुष्ठान प्रदर्शन है। प्रशिक्षित सिद्ध समाधिस्थ अवस्था में सुलगते अंगारों (धुनी) पर चलते, लोटते और कलाबाजी करते हैं। यह अनुष्ठान एक साथ भक्ति-अर्पण, आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन और समुदाय-पुष्टि करने वाला प्रदर्शन है।
जसनाथ पंथ की स्थापना जेसनाथ जी (1482–1527 ई., जन्म कतरियासर, बीकानेर) ने की थी — नाथ परम्परा के एक सन्त। उनके अनुयायी बीकानेर और नागौर जिलों में लगभग 1.2 लाख हैं।
कठपुतली
कठपुतली राजस्थान का परम्परागत तार-कठपुतली रंगमंच है, जिसे भाट समुदाय (नट समुदाय) संचालित करता है। कठपुतलियाँ आम या कदम्ब की लकड़ी से तराशी जाती हैं और परम्परागत राजस्थानी वेशभूषा के लघु संस्करण पहनाए जाते हैं। कठपुतली प्रदर्शन परम्परागत रूप से अमर सिंह राठौड़, पृथ्वीराज चौहान और अन्य राजपूत नायकों की कथाएँ सुनाता था; समकालीन प्रदर्शनों में लोक कथाएँ और सामाजिक सन्देश भी शामिल हैं।
राजस्थान भारत का प्राथमिक कठपुतली उत्पादन केन्द्र है। कठपुतली कॉलोनी, जयपुर (अम्बा बारी के निकट) 2017 में शहरी पुनर्विकास द्वारा अधिकांश कलाकारों के स्थानान्तरण तक कठपुतली कलाकारों की विश्व की सबसे बड़ी बस्ती (2,000+ परिवार) थी। कॉलोनी के विस्थापन ने राष्ट्रीय विवाद और सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमेबाजी (2015–2021) उत्पन्न की।
अन्य नृत्य रूप (सारांश)
| नृत्य | समुदाय | क्षेत्र | अवसर |
|---|---|---|---|
| चकरी | कंजर महिलाएँ | हाड़ौती (कोटा-बूँदी) | मेले और त्योहार |
| झूमा | भील महिलाएँ | बाँसवाड़ा-डूँगरपुर | जनजातीय उत्सव |
| वालर | गरासिया समुदाय | सिरोही-आबू | होली, जनजातीय मेले |
| ढोल नृत्य (चंग) | मिश्रित समुदाय | शेखावाटी (झुंझुनू-सीकर) | होली मौसम |
| ढोलना | महिलाएँ (ग्रामीण राजस्थान) | जयपुर-टोंक | विवाह |
| नेजा नृत्य | सभी समुदाय | बीकानेर-चुरू | होली (नेजा उत्सव) |
| डाँडिया/गरबा | गुजरात-सीमा की महिलाएँ | पाली-जालोर | नवरात्रि |
स्रोत: राजस्थान राज्य गजेटियर, लोक कला खण्ड; राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, 2022
