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इतिहास

संभावित प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

19वीं-20वीं शताब्दी: 1857 का विद्रोह, किसान एवं जनजातीय आंदोलन, राजनीतिक जागृति, एकीकरण

पेपर I · इकाई 1 अनुभाग 13 / 14 0 PYQ 51 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

संभावित प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

प्र1 (5 अंक — 50 शब्द): राजपूताना के शासक 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों के प्रति वफादार क्यों रहे?

आदर्श उत्तर:

राजपूताना के शासकों ने 1817–18 में सहायक संधियाँ की थीं, सैन्य स्वायत्तता के बदले ब्रिटिश संरक्षण प्राप्त किया। वे किसान-सिपाही गठबंधन से भयभीत थे और ब्रिटिश-गारंटीकृत उत्तराधिकार अधिकारों को महत्व देते थे। जयपुर, जोधपुर, उदयपुर और बीकानेर शासकों ने दमन में सक्रिय सहयोग दिया, जयपुर को वफादारी के पुरस्कार में कोटपुतली जिला मिला।


प्र2 (5 अंक — 50 शब्द): राजपूताना में 1857 के विद्रोह में आऊवा के ठाकुर कुशाल सिंह की भूमिका की परीक्षा कीजिए।

आदर्श उत्तर:

आऊवा के कुशाल सिंह ने जोधपुर लीजन के विद्रोहियों और असंतुष्ट राजपूत योद्धाओं को एकजुट कर राजपूताना का एकमात्र महत्वपूर्ण सशस्त्र प्रतिरोध किया। चेतवास का युद्ध (8 सितंबर 1857) विद्रोही विजय था जिसमें ब्रिटिश पोलिटिकल एजेंट कैप्टन मेसन मारे गए। आऊवा किला गिरने (जनवरी 1858) के बाद, कुशाल सिंह पर मुकदमा चला किंतु प्रत्यक्ष साक्ष्य के अभाव में बरी हुए।


प्र3 (5 अंक — 50 शब्द): राजस्थान के बिजोलिया किसान आंदोलन की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए।

आदर्श उत्तर:

बिजोलिया आंदोलन (1897–1941) मेवाड़ के भीलवाड़ा में भारत का सबसे लंबा किसान आंदोलन था। विजय सिंह पथिक ने 84 अवैध लागों (1916) का प्रलेखन किया और कृषि प्रतिरोध को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा। इसकी शक्ति तीन चरणों में निरंतर संगठन और राष्ट्रीय जुड़ाव थी। इसकी सीमा व्यक्तिगत नेताओं पर निर्भरता थी; पथिक की ऊर्जा के बिना चरण 2 स्थिर रहा जब तक माणिक्यलाल वर्मा ने 1927 में पुनर्जीवित नहीं किया।


प्र4 (5 अंक — 50 शब्द): गोविंद गुरु और 1913 के मानगढ़ पहाड़ी नरसंहार पर एक टिप्पणी लिखिए।

आदर्श उत्तर:

गोविंद गुरु (1858–1931) ने 1883 में सम्प सभा की स्थापना कर भील समुदायों को सामाजिक सुधार और जनजातीय अधिकारों के लिए संगठित किया। 17 नवंबर 1913 को ब्रिटिश-मेवाड़ बलों ने मानगढ़ पहाड़ी (बाँसवाड़ा) पर एकत्रित लगभग 1,500 आदिवासियों पर गोलीबारी कर सबको मारा — इसे "आदिवासी जलियाँवाला बाग" कहा जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने नवंबर 2022 में मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय महत्व का स्थल घोषित किया।


प्र5 (10 अंक — 150 शब्द): राजपूताना की रियासतों के भारतीय संघ में एकीकरण (1947–1950) में सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन की भूमिका की परीक्षा कीजिए।

आदर्श उत्तर:

राजपूताना की 22 रियासतें सरदार पटेल की राजनीतिक रणनीति और वी.पी. मेनन के प्रशासनिक निष्पादन से छह चरणों (मार्च 1948 – नवंबर 1956) में एकीकृत हुईं।

पटेल और मेनन ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के तहत विलय-पत्र का उपयोग किया। उनकी प्रमुख रणनीतियाँ: (1) चरण 3 अधिमिलन (18 अप्रैल 1948) के लिए उदयपुर के महाराणा भूपाल सिंह को लक्षित करना — जिनके विलय ने छोटी रियासतों का प्रतिरोध तोड़ दिया; (2) प्रीवी पर्स (उदयपुर ₹26 लाख, जयपुर ₹18 लाख, जोधपुर ₹17.5 लाख) देकर स्वैच्छिक विलय को आर्थिक रूप से तर्कसंगत बनाना; (3) जोधपुर के हनवंत सिंह — जिन्होंने पाकिस्तान विलय तलाशा — के साथ मेनन का भौगोलिक असंभवता पर बल देते हुए प्रत्यक्ष व्यक्तिगत हस्तक्षेप।

एकीकरण ने क्षेत्रफल में भारत का सबसे बड़ा राज्य (3,42,239 वर्ग किमी) बनाया, राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत अजमेर-मेरवाड़ा विलय से पूर्ण। उल्लेखनीय रूप से, किसी राजपूताना रियासत के विरुद्ध सैन्य अभियान की आवश्यकता नहीं पड़ी — पटेल-मेनन की कूटनीतिक कुशलता का प्रमाण। प्रीवी पर्स बाद में 26वें संवैधानिक संशोधन (1971) द्वारा समाप्त किए गए।


प्र6 (10 अंक — 150 शब्द): राजपूताना में राजनीतिक जागृति के साधन के रूप में प्रजा मंडल आंदोलन का मूल्यांकन कीजिए।

आदर्श उत्तर:

प्रजा मंडल आंदोलन राजपूताना की 22 रियासतों में उत्तरदायी शासन की संगठित माँग था, जहाँ 1947 से पहले नागरिक स्वतंत्रताएँ, विधानमंडल और सभा का अधिकार नहीं था।

आंदोलन 1931 में जयपुर में अर्जुन लाल सेठी और जमनालाल बजाज के नेतृत्व में शुरू हुआ और 1939 तक मेवाड़ (माणिक्यलाल वर्मा), जोधपुर (जय नारायण व्यास) और सिरोही (गोकुलभाई भट्ट) सहित 8 रियासतों में फैला। लुधियाना ISPC अधिवेशन (1939) में गाँधी के समर्थन ने इसे राष्ट्रीय वैधता दी।

शक्तियाँ: इस आंदोलन ने राजस्थान के पहले तीन मुख्यमंत्री (हीरालाल शास्त्री, जय नारायण व्यास, माणिक्यलाल वर्मा) दिए और कृषि शिकायतों को राजनीतिक माँगों से जोड़ा। सीमाएँ: जयपुर प्रजा मंडल का भारत छोड़ो (1942) के प्रति सतर्क रुख — हीरालाल शास्त्री का प्रत्यक्ष कार्रवाई पर "जीवन कुटी" रचनात्मक कार्यक्रम — को राष्ट्रीय मुक्ति पर संगठनात्मक अस्तित्व को प्राथमिकता देने की आलोचना मिली। मेवाड़ प्रजा मंडल के 1942 में अधिक सक्रिय रुख से तुलना उल्लेखनीय थी।

कुल मिलाकर, प्रजा मंडल रियासती जन-आकांक्षाओं और स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच अनिवार्य सेतु थे।