सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन
मुख्य बिंदु
त्रिपक्षीय भूमि व्यवस्था
- जागीर — सैन्य सेवा के बदले सामंतों को आवंटित
- खालसा — राज्य के प्रत्यक्ष प्रबंधन में आने वाली राजकीय भूमि
- भोम — भोमिया राजपूतों के पास आनुवंशिक अधिकार से रखी गई गाँव की भूमि
- तीनों श्रेणियाँ अलग-अलग राजनीतिक और राजकोषीय कार्य करती थीं
रेख और हासिल राजस्व प्रणाली
- रेख मारवाड़ में मानक राजस्व आकलन की इकाई थी
- प्रत्येक गाँव को क्षेत्र, मिट्टी और फसल के आधार पर एक निश्चित रेख मूल्य दिया जाता था
- हासिल वास्तव में वसूला गया राजस्व था
- रेख और हासिल के बीच का अंतर प्रशासनिक दक्षता का माप था
मुगल राजस्व प्रभाव
- अकबर की दहसाला प्रणाली (1580 ई.) — उपज का 10 वर्षीय औसत
- मुगल अधीनता वाले राजपूताना राज्यों में इसे अपनाया गया
- जब्त फसल माप पूर्वी राजस्थान (अंबर/जयपुर) में लागू की गई
- टोडर मल ने इन्हें अजमेर सूबे में लागू किया
बेगार — सामंती शोषण
- निम्न जाति के काश्तकारों और जनजातियों से जबरन बिना वेतन के काम लिया जाता था
- जागीरदारों द्वारा कृषि, भार वहन और घरेलू सेवा के लिए वसूला जाता था
- राजस्थान की सामंती राजस्व व्यवस्था की सबसे शोषणकारी विशेषता
- बिजोलिया (1897), बेगूं (1921) और एकी (1921) आंदोलनों का प्रत्यक्ष कारण
प्रशासनिक पदानुक्रम
- दीवान — मुख्यमंत्री और राजस्व प्रमुख
- फौजदार — जिला सैन्य-प्रशासनिक प्रमुख
- हाकिम — उप-जिला अधिकारी
- पटवारी — गाँव का राजस्व लेखाकार
- चौधरी — गाँव का मुखिया
कर्नल जेम्स टॉड का दस्तावेजीकरण
- Annals and Antiquities of Rajasthan (2 खंड, 1829 और 1832)
- राजपूत राजस्व रीति-रिवाजों और जागीरदारी कार्यकाल का पहला व्यवस्थित दस्तावेजीकरण
- टॉड ने पश्चिमी राजपूताना के राजनीतिक एजेंट के रूप में कार्य किया (1818–22)
- RPSC परीक्षाओं के लिए अपरिहार्य प्राथमिक स्रोत
ब्रिटिश बंदोबस्त कार्यवाहियाँ
- औपचारिक बंदोबस्त कार्यवाहियाँ 1870 के दशक से शुरू हुईं
- परंपरागत आकलन की जगह लिखित सर्वेक्षण आया
- मारवाड़ का पहला नियमित बंदोबस्त A.P. Nicholson (1891–95) द्वारा
- ब्रिटिश भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों की प्रक्रियाओं पर आधारित
कोतवाल — नगरीय प्रशासक
- राजपूत युग की राजधानियों में नगरीय प्रशासन और कानून-व्यवस्था अधिकारी
- पुलिसिंग, बाट-माप विनियमन के लिए जिम्मेदार
- हाट (बाजार) लेनदेन पर कर वसूलता था
- फौजदार का नगरीय समकक्ष
स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार
- राजस्थान भूमि सुधार एवं जागीर पुनर्ग्रहण अधिनियम, 1952 — 16,000 से अधिक जागीरें समाप्त कीं
- काश्तकारों को सीधे राज्य के अधीन अधिभोग अधिकार (वैधानिक किरायेदार) मिले
- राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 ने सभी क्षेत्रों में एकसमान ढाँचा बनाया
- मारवाड़ राजस्व एवं काश्तकारी अधिनियम, 1949 अग्रणी विधान था
नजराना और भेंट — अर्ध-राजकोषीय वसूलियाँ
- नजराना — नए जागीरदार द्वारा शासक सरदार को दी जाने वाली एकमुश्त भेंट
- भेंट — त्योहारों और विशेष अवसरों पर अनिवार्य औपचारिक उपहार
- ये औपचारिक राजस्व प्रणाली से परे अर्ध-राजकोषीय वसूलियाँ थीं
- राजपूत राजस्व को शुद्ध मुगल शैली के राजस्व फार्मिंग से अलग करती थीं
टोडर मल का भूमि वर्गीकरण
- अजमेर के सूबे में जब्ती/दहसाला व्यवस्था लागू की
- राजस्व उद्देश्यों के लिए भूमि को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया
- पोलज (वार्षिक रूप से खेती योग्य), परौती (समय-समय पर परती)
- चाचर (तीन वर्षीय परती), बंजर (अकृष्ट बंजर)
मेवाड़ में पाइक व्यवस्था
- पाइक — आनुवंशिक ग्राम रक्षक और प्रशासनिक कर्तव्य
- मेवाड़ में निम्न-रैंकिंग समुदाय के सदस्यों को सौंपा गया
- सेवा के बदले छोटे भूमि अनुदान से पुरस्कृत किया गया
- ग्राम स्तर पर जागीर सिद्धांत का सूक्ष्म-स्तरीय रूप
2026 में ऐतिहासिक कस्बों का नामकरण
- राजस्थान सरकार ने मार्च 2026 में दो ऐतिहासिक प्रशासनिक कस्बों का नाम बदला
- कामान (भरतपुर) का नाम कामवन रखा गया
- जहाजपुर (भीलवाड़ा) का नाम यज्ञपुर रखा गया
- पुरालेखीय साक्ष्यों से प्रमाणित मध्यकालीन प्रशासनिक स्थलनामों की पुनर्स्थापना
