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इतिहास

राजपूत राज्यों में प्रशासनिक पदानुक्रम

राजस्व एवं प्रशासनिक व्यवस्थाएँ तथा उनके बदलते स्वरूप

पेपर I · इकाई 1 अनुभाग 5 / 15 0 PYQ 41 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

राजपूत राज्यों में प्रशासनिक पदानुक्रम

केंद्रीय प्रशासन

राजपूत राज्य का प्रशासनिक तंत्र शासक (महाराजा/महाराणा) के इर्द-गिर्द संगठित था, जिसमें दीवान सबसे शक्तिशाली पदाधिकारी होता था।

दीवान (प्रधानमंत्री/मुख्य राजस्व प्रशासक): आधुनिक सरकारें जो कार्य मुख्यमंत्री, वित्त मंत्री और गृह मंत्री में बाँटती हैं, वह सब दीवान के पास होते थे। मारवाड़ में दीवान कभी राजपूत सामंत होता था (जैसे मुहणोत नैणसी, जो जसवंत सिंह प्रथम के अधीन दीवान रहे), कभी ब्राह्मण या महाजन। दीवान तोषाखाना (राज्य का खजाना) का प्रबंधन करता, जागीर आवंटन की देखरेख करता और फौजदारों से अपीलें सुनता था।

मुसाहिब: शासक का विश्वस्त सलाहकार, कभी-कभी दीवान से भी अधिक प्रभावशाली — बिना किसी औपचारिक प्रशासनिक पदनाम के दरबार का अंदरूनी व्यक्ति।

पेशकार: दूसरे दर्जे का राजस्व अधिकारी जो दैनिक प्रशासनिक पत्राचार संभालता और जागीर माफी (छूट) आवेदन प्रक्रिया करता था।

क्षेत्रीय प्रशासन

स्तर पदनाम क्षेत्राधिकार प्राथमिक कार्य
प्रांत फौजदार परगना/जिला सैन्य कमान, राजस्व वसूली, कानून-व्यवस्था
उप-जिला हाकिम उप-परगना नागरिक प्रशासन, स्थानीय विवाद निपटान
नगरीय कोतवाल कस्बा/बाजार पुलिसिंग, बाट-माप, बाजार नियमन
गाँव चौधरी ग्राम समूह मुखिया, राज्य के साथ राजस्व संपर्क
राजस्व पटवारी एकल गाँव भूमि अभिलेख, फसल माप
राजस्व गिरदावर सर्किल (10-20 गाँव) पटवारियों की निगरानी, क्षेत्र निरीक्षण

स्रोत: कर्नल जेम्स टॉड, Annals and Antiquities of Rajasthan (1829–32, खंड I); B.L. Bhadani, Peasants, Artisans and Entrepreneurs (1999)

फौजदार: परगना स्तर के अधिकारी में सैन्य और राजस्व कार्य एकत्रित थे — यह संयोजन राजपूत प्रशासन की विशेषता थी। फौजदार स्थानीय घुड़सवार बल की कमान करता, राजस्व वसूली की निगरानी करता (प्रायः स्थानीय महाजनों को उप-ठेके पर देकर) और दीवान को रिपोर्ट करता था। मारवाड़ में प्रमुख परगनों में नागौर, सोजत, मेड़ता और पाली शामिल थे — प्रत्येक का अपना फौजदार होता था।

कोतवाल: फौजदार का नगरीय समकक्ष, विशेष रूप से कस्बे (बाजार कस्बे) और राजधानी शहर के लिए जिम्मेदार। राजस्थानी प्रशासनिक ग्रंथों के अनुसार कोतवाल के कर्तव्यों में शामिल थे:

  • शांति बनाए रखना और चोरी दबाना
  • हाट (साप्ताहिक ग्रामीण बाजार) और पंसारी (किराना) व्यापार का नियमन
  • बाट-माप के मानकों का प्रवर्तन (पंसारी प्रणाली)
  • बाजार लेनदेन पर बाजार कर वसूलना
  • नगर रजिस्टर में जन्म, मृत्यु और प्रमुख लेनदेन दर्ज करना

पटवारी और भूमि अभिलेख: पटवारी खसरा (क्षेत्र रजिस्टर), खतौनी (काश्तकार रजिस्टर) और मौसमी फसल रिपोर्ट रखता था। मध्यकालीन राजस्थान की पटवारी प्रणाली उससे कहीं अधिक विकसित थी जितनी अक्सर मानी जाती है — नैणसी की विगत अनिवार्य रूप से पूरे मारवाड़ से पटवारी अभिलेखों का संकलन थी। ब्रिटिश बंदोबस्त कार्यवाहियाँ सीधे इसी दस्तावेजी ढाँचे पर आधारित थीं।

ड्योढ़ी प्रशासन: विशेष महल पदाधिकारी

राजपूत दरबारों में औपचारिक राजस्व पदानुक्रम से परे कई विशेष प्रशासनिक पद थे। ड्योढ़ीदार (द्वारपाल/देहलीज-रक्षक) दरबारी पहुँच और शिष्टाचार का प्रबंधन करते थे। अन्य विशेष पदाधिकारियों में शामिल थे:

  • खानसामाह: घरेलू भंडार प्रबंधक
  • बख्शी: सैन्य बलों का वेतनदाता
  • मीर बख्शी: मुख्य वेतनदाता (मुगल-प्रभावित पद जो राजपूत दरबारों में अपनाया गया)
  • अखबारनवीस: दरबारी इतिहासकार और सूचना संवाददाता
  • थानेदार: ग्रामीण क्षेत्रों में थाना प्रमुख