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मारवाड़ के राठौड़
राव जोधा और जोधपुर की स्थापना (1459 ई.)
राठौड़ वंश अपनी वंशावली सिआजी (जो लगभग 1212 ई. में कन्नौज से राजस्थान आए) से जोड़ता है। वंश का निर्णायक समेकन राव जोधा (1438–1489 ई.) के समय हुआ:
- 1459 ई. में जोधपुर नगर की स्थापना की, राजधानी मंडोर से यहाँ स्थानांतरित की
- 122 मीटर ऊँची प्राकृतिक चट्टान पर मेहरानगढ़ दुर्ग बनवाया — पश्चिमी राजस्थान का सर्वाधिक सैन्य-प्रभावशाली दुर्ग; इसका नाम मिहिरगढ़ (सूर्य-देव का किला) से व्युत्पन्न है
- परवर्ती राठौड़ शासकों ने आंतरिक महल जोड़े: मोती महल (मोतियों का महल), फूल महल (फूलों का महल), और शीश महल (दर्पण महल)
मेहरानगढ़ दुर्ग की स्थापत्य विशेषताएँ (RPSC मुख्य परीक्षा 2024 में परीक्षित):
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | 1459 ई. में राव जोधा द्वारा |
| ऊँचाई | मैदान से 122 मीटर |
| परकोटा | ~10 किमी दीवारें |
| द्वार (पोल) | 7 द्वार: जयपोल (1806), फतेहपोल (1707), देड़कामग्रा पोल, भैरों पोल, गोपाल पोल, लोहा पोल, अमृता पोल |
| जयपोल | 1806 ई. में महाराजा मान सिंह ने जयपुर-बीकानेर पर विजय के उपलक्ष्य में बनाया |
| फतेहपोल | महाराजा अजित सिंह की मुगलों को निष्कासन (1707 ई.) की स्मृति में |
| तोप के गोलों के निशान | फतेहपोल पर — जयपुर सेना के 1808 ई. आक्रमण से |
| आंतरिक महल | मोती महल, फूल महल, शीश महल, तख्त विलास, झाँकी महल |
| शस्त्रागार | भारत के सर्वश्रेष्ठ शाही शस्त्र-संग्रहों में से एक |
| UNESCO दर्जा | राजस्थान के पर्वतीय दुर्गों का भाग (2013) |
स्रोत: भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण; मेहरानगढ़ म्यूज़ियम ट्रस्ट, फोर्ट गाइडबुक (2022)
राव मालदेव (1532–1562 ई.): मारवाड़ के वर्चस्व के निर्माता
राव मालदेव राजनीतिक विस्तार की दृष्टि से सर्वाधिक शक्तिशाली राठौड़ शासक हैं। उनके 30 वर्षों के शासन ने मारवाड़ को सबसे बड़े राजपूत राज्य में बदल दिया।
क्षेत्रीय विस्तार
गद्दी-प्राप्ति के समय ~15,000 वर्ग किमी के मूल जोधपुर राज्य से मालदेव ने नागौर, अजमेर, मेड़ता, सांचोर, पाली, जैतारण तथा बीकानेर और गुजरात के भागों को मिलाकर लगभग 80,000 वर्ग किमी तक विस्तार किया। अपने चरम पर उन्होंने वर्तमान राजस्थान का लगभग आधा भाग नियंत्रित किया।
हुमायूँ और शेरशाह से संबंध (RPSC मुख्य परीक्षा 2013, 20 अंक — PYQ अभिलेख में इस विषय पर सर्वाधिक अंकों का प्रश्न)
- 1540 ई.: कन्नौज में पराजय के बाद हुमायूँ के लिए मालदेव ने जोधपुर में शरण का प्रस्ताव भेजा; हुमायूँ 10,000 सैनिकों के साथ जोधपुर की ओर चल पड़ा
- खैरवा घटना (1542 ई.): मालदेव — संभवतः हुमायूँ की सेना के आकार से चिंतित होकर या शेरशाह के जाली पत्रों से भ्रमित होकर — अपना निमंत्रण वापस ले लिया; हुमायूँ को फ़ारस भागने के लिए विवश होना पड़ा
- सामेल/गिरि-सुमेल का युद्ध (5 जनवरी 1544 ई.): शेरशाह 80,000 सैनिकों के साथ आक्रमण किया; मालदेव के सेनापति जैता और कूंपा 20,000 सैनिकों के साथ डटे रहे; शेरशाह की दुष्प्रचार नीति से मालदेव पीछे हट गए किंतु जैता और कूंपा लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए; शेरशाह ने कथित रूप से कहा: "मुट्ठी भर बाजरे के लिए मैंने लगभग हिंदुस्तान का साम्राज्य खो दिया"
- पुनरुद्धार: शेरशाह की मृत्यु के बाद 1545 ई. में मालदेव ने जोधपुर वापस लिया; 1562 ई. तक अधिकांश क्षेत्र पुनः प्राप्त कर लिया
सांस्कृतिक संरक्षण
मालदेव ने अपने दरबार में मारवाड़ चित्र-शैली को संरक्षण दिया। इसी काल में राठौड़ संरक्षण में ढोला-मारू चित्र परम्परा फली-फूली, जो ढोला और मारू के लोक-प्रेम का चित्रण करती है।
जसवंत सिंह प्रथम और परवर्ती राठौड़
महाराजा जसवंत सिंह प्रथम (1638–1678 ई.) ने जटिल मुगल उत्तराधिकार युद्धों में सफलतापूर्वक नेतृत्व किया। धर्मत के युद्ध (1658 ई.) में वे औरंगजेब के विरुद्ध शाहजहाँ की ओर से लड़े और पराजित हुए। औरंगजेब ने बाद में उन्हें उत्तर-पश्चिम, अफगानिस्तान सहित, में सैन्य कमांडर के रूप में नियुक्त किया। 1678 ई. में जमरूद (पेशावर के निकट) में पुत्र-रहित मृत्यु से:
- मारवाड़ उत्तराधिकार संकट उत्पन्न हुआ
- औरंगजेब के विरुद्ध राठौड़ विद्रोह हुआ
- 1680–90 के दशक का व्यापक राजपूत-मुगल विखंडन हुआ
