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इतिहास

संभावित प्रश्न एवं उत्तर

शासकों की राजनीतिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियाँ (18वीं शताब्दी तक)

पेपर I · इकाई 1 अनुभाग 15 / 16 0 PYQ 49 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

संभावित प्रश्न एवं उत्तर

प्र1 (5 अंक — 50 शब्द)

मेवाड़ के राणा कुम्भा की राजनीतिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों का मूल्यांकन कीजिए।

आदर्श उत्तर (HI): राणा कुम्भा (1433–1468 ई.) मेवाड़ के सर्वश्रेष्ठ शासक थे। राजनीतिक रूप से उन्होंने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी को सारंगपुर (1437 ई.) में पराजित किया, 84 दुर्गों पर नियंत्रण रखा और कुम्भलगढ़ की 36 किमी लंबी परकोटा दीवार बनवाई। सांस्कृतिक रूप से उन्होंने संगीत-राज ग्रंथ रचा और चित्तौड़गढ़ में विजय स्तम्भ (1448 ई.) का निर्माण करवाया।


प्र2 (5 अंक — 50 शब्द)

राजस्थान के इतिहास में हल्दीघाटी के युद्ध (1576 ई.) का महत्त्व परखिए।

आदर्श उत्तर (HI): हल्दीघाटी का युद्ध (18 जून 1576 ई.) खमनोर दर्रे (राजसमंद) में महाराणा प्रताप की ~20,000 सेना — अफगान हाकिम खान सूर और भील तीरंदाज सहित — और अकबर की मान सिंह I के नेतृत्व में 80,000 सेना के बीच हुआ। युद्ध सामरिक रूप से अनिर्णायक रहा — प्रताप को पकड़ा नहीं जा सका — जो मुगल प्रभुसत्ता के विरुद्ध मेवाड़ के अटूट प्रतिरोध का प्रतीक बना।


प्र3 (5 अंक — 50 शब्द)

मुगल साम्राज्य में आमेर के मान सिंह I की भूमिका का वर्णन कीजिए।

आदर्श उत्तर (HI): आमेर के मान सिंह I (1550–1614 ई.) अकबर के सबसे विश्वसनीय राजपूत सेनापति थे और 7,000 जात मनसब पाने वाले पहले गैर-मुगल थे। उन्होंने बंगाल, बिहार, काबुल और उड़ीसा के राज्यपाल के रूप में सेवा की; हल्दीघाटी में प्रताप को पराजित किया; आमेर में मान सिंह महल और वृंदावन में गोविंददेव मंदिर बनवाया। उनका गठबंधन मुगल-राजपूत राजनीतिक एकीकरण का प्रतीक था।


प्र4 (5 अंक — 50 शब्द)

चाहमान राजवंश की सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विरासत पर एक टिप्पणी लिखिए।

आदर्श उत्तर (HI): चाहमान वंश की साहित्यिक विरासत का केंद्र पृथ्वीराज III (1179–1192 ई.) हैं, जिन्होंने दरबारी कवि चंद बरदाई से पृथ्वीराज रासो की रचना कराई — राजस्थान का सर्वाधिक प्रसिद्ध मध्यकालीन महाकाव्य। वंश ने रणथंभौर दुर्ग का भी निर्माण किया। हम्मीरदेव के प्रतिरोध (1301 ई.) को नयनचंद्र सूरि की संस्कृत हम्मीर महाकाव्य (लगभग 1400 ई.) में अमर किया गया।


प्र5 (10 अंक — 150 शब्द)

मेवाड़ के महाराणा प्रताप के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक योगदानों की विवेचना कीजिए। मुगल सत्ता के प्रति उनके प्रतिरोध ने राजस्थान की ऐतिहासिक स्मृति को किस प्रकार आकार दिया?

आदर्श उत्तर (HI): महाराणा प्रताप (1572–1597 ई.) उस समय सत्तारूढ़ हुए जब कछवाहा, राठौड़, हाड़ा सहित अधिकांश राजपूत वंशों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी। प्रताप ने अकेले इसे अस्वीकार किया।

राजनीतिक रूप से हल्दीघाटी (18 जून 1576 ई.) के अनिर्णायक युद्ध के बाद प्रताप अरावली में पीछे हट गए और 25 वर्षों तक छापामार युद्ध जारी रखा। 1585 ई. तक उन्होंने राणा पूंजा के भील समुदाय की सहायता से अधिकांश पश्चिमी मेवाड़ पुनः प्राप्त कर लिया। उन्होंने चावंड (डूंगरपुर) में अपनी राजधानी स्थापित की और 1597 ई. तक चित्तौड़गढ़, मांडलगढ़ और अजमेर को छोड़कर संपूर्ण मेवाड़ पर नियंत्रण कर लिया।

सांस्कृतिक रूप से उन्होंने चावंड में मेवाड़ चित्र-शैली को संरक्षण दिया; रसिकप्रिया पांडुलिपि चित्र (लगभग 1594 ई.) मेवाड़ शैली के प्राचीनतम दिनांकित उदाहरण हैं।

ऐतिहासिक रूप से प्रताप का प्रतिरोध राजस्थानी मौखिक परम्परा में आत्मसमर्पण के विरुद्ध सम्प्रभुता के प्रतिमान के रूप में समाहित हो गया। उनके घोड़े चेतक राजपूत बलिदान का प्रतीक बन गए।


प्र6 (10 अंक — 150 शब्द)

जयपुर के सवाई जय सिंह द्वितीय के महत्त्व की परीक्षा कीजिए, जो सैन्य-राजनीतिक शक्ति के साथ वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संरक्षण को जोड़ने वाले शासक थे।

आदर्श उत्तर (HI): सवाई जय सिंह द्वितीय (1699–1743 ई.) सैन्य कूटनीति, नगर-नियोजन और वैज्ञानिक संरक्षण को एक साथ साधने वाले 18वीं शताब्दी के अद्वितीय राजपूत शासक थे।

राजनीतिक रूप से उन्होंने औरंगजेब के बाद के मुगल पतन में कुशलतापूर्वक नेतृत्व किया। 1708 की आमेर उत्तराधिकार विवाद में भूमिका निभाई, आगरा और मालवा के मुगल राज्यपाल बने, और मराठा आक्रमण के विरुद्ध हुरड़ा संधि (1734) में राजपूत संघ बनाने का प्रयास किया।

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि 1727 ई. में भूमिकर नौ-खंड योजना पर बसाया गया जयपुर नगर था — भारत का पहला योजनाबद्ध राजधानी नगर। जयपुर 2019 में UNESCO विश्व धरोहर (दीवारबंद नगरी) घोषित हुआ।

वैज्ञानिक रूप से उन्होंने 1724–1735 ई. के बीच पाँच जंतर मंतर वेधशालाएँ बनाईं। जयपुर का 27 मीटर ऊँचा सम्राट यंत्र 2 सेकंड की सटीकता से समय बताता है। फ्रांसीसी जेसुइट इमैनुएल फिगुएरेडो के सहयोग से संकलित ज़ीज-ए-मुहम्मद शाही खगोलीय सारणियाँ भारत-यूरोपीय वैज्ञानिक सहयोग का दुर्लभ उदाहरण हैं।