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इतिहास

आदर्श उत्तर रूपरेखा

शासकों की राजनीतिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियाँ (18वीं शताब्दी तक)

पेपर I · इकाई 1 अनुभाग 12 / 16 0 PYQ 49 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

आदर्श उत्तर रूपरेखा

5-अंक उत्तर टेम्पलेट (50 शब्द)

प्रश्न (RPSC 2024 शैली पर आधारित): मेहरानगढ़ दुर्ग की स्थापत्य विशेषताओं एवं महत्त्व का वर्णन कीजिए।

आदर्श उत्तर:

मेहरानगढ़ दुर्ग, 1459 ई. में राव जोधा द्वारा 122 मीटर ऊँची चट्टान पर स्थापित, मारवाड़ का प्रमुख सैन्य केंद्र है। इसके 7 द्वारों में जयपोल (1806 ई., जयपुर पर विजय) और फतेहपोल (1707 ई., मुगलों का निष्कासन) प्रमुख हैं। आंतरिक महल — मोती महल, फूल महल, शीश महल — राठौड़ सौंदर्य-उपलब्धि के प्रतीक हैं। 2013 में UNESCO विश्व धरोहर घोषित।

शब्द-बजट: परिभाषा/स्थापना (10) + द्वार (15) + आंतरिक संरचनाएँ (15) + UNESCO दर्जा (10) = ~50 शब्द


प्रश्न (RPSC 2016 शैली पर आधारित): कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में महाराणा कुम्भा के योगदान की विवेचना कीजिए।

आदर्श उत्तर:

राणा कुम्भा (1433–1468 ई.) ने चित्तौड़गढ़ में विजय स्तम्भ (1448 ई.) बनवाया — राजस्थान के राज्य-प्रतीक पर अंकित 9-मंजिला, 37 मीटर ऊँचा विजय स्तम्भ। उन्होंने संगीत-राज, एक 5-खंड संगीतशास्त्र ग्रंथ, और 4 वैदिक टीकाएँ लिखीं। उनके 32 दुर्गों में कुम्भलगढ़ (36 किमी दीवार) शामिल है। वे राजपूत योद्धा-विद्वान आदर्श के प्रतीक हैं।

शब्द-बजट: स्मारक (15) + साहित्य (15) + दुर्ग (10) + निष्कर्ष (10) = ~50 शब्द


10-अंक उत्तर टेम्पलेट (150 शब्द)

प्रश्न (RPSC 2013 शैली पर आधारित): राव मालदेव के हुमायूँ और शेरशाह के साथ संबंधों का वर्णन कीजिए।

आदर्श उत्तर:

परिचय: मारवाड़ के राव मालदेव (1532–1562 ई.) अपने युग के सर्वाधिक शक्तिशाली राजपूत शासक थे, जिन्होंने ~80,000 वर्ग किमी नियंत्रित किया — और उनके कूटनीतिक निर्णयों ने उत्तर भारतीय राजनीति को निर्णायक रूप से आकार दिया।

प्रमुख बिंदु:

  1. मालदेव-हुमायूँ प्रकरण (1540–42 ई.): कन्नौज में पराजय के बाद मालदेव ने शरण का प्रस्ताव दिया। जब हुमायूँ 10,000 सैनिकों के साथ आगे बढ़ा, तो मालदेव — कथित रूप से शेरशाह के जाली पत्रों से भ्रमित होकर — खैरवा (1542 ई.) में समर्थन वापस ले लिया, जिससे हुमायूँ फ़ारस भागने के लिए बाध्य हुआ।

  2. सामेल/गिरि-सुमेल का युद्ध (5 जनवरी 1544 ई.): शेरशाह 80,000 सैनिकों के साथ आक्रमण किया। मालदेव के सेनापति जैता और कूंपा वीरतापूर्वक डटे रहे; शेरशाह की दुष्प्रचार नीति से मालदेव पीछे हट गए। शेरशाह ने प्रसिद्ध रूप से कहा कि "मुट्ठी भर बाजरे के लिए" उसने लगभग हिंदुस्तान खो दिया।

  3. पुनरुद्धार: शेरशाह की मृत्यु के बाद 1545 ई. में मालदेव ने जोधपुर पुनः प्राप्त किया और 1562 ई. तक अधिकांश क्षेत्र पुनर्स्थापित किए।

  4. महत्त्व: हुमायूँ के साथ मालदेव की झिझक ने मुगल पुनर्स्थापना को वर्षों विलंबित किया; सामेल में उनके प्रतिरोध ने सूर साम्राज्य के विरुद्ध राजपूत सैन्य क्षमता का प्रदर्शन किया।

निष्कर्ष: मालदेव का शासनकाल दर्शाता है कि राजपूत राज्यों ने 16वीं शताब्दी के मध्य के अस्थिर मुगल-सूर शक्ति-शून्य में जीवित रहने की रणनीति के रूप में कूटनीतिक द्विधा का उपयोग कैसे किया।

शब्द-बजट: परिचय (20) + बिंदु 1 (35) + बिंदु 2 (35) + बिंदु 3 (25) + बिंदु 4 (20) + निष्कर्ष (20) ≈ 155 शब्द


प्रश्न (RPSC 2023 शैली पर आधारित — 10 अंकों तक विस्तारित): कला, विज्ञान और नगर-नियोजन में सवाई जय सिंह द्वितीय के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।

आदर्श उत्तर:

परिचय: आमेर-जयपुर के सवाई जय सिंह द्वितीय (1699–1743 ई.) 18वीं शताब्दी के राजपूताना के सर्वाधिक बौद्धिक रूप से कुशल शासक थे, जिन्होंने राजनीति को खगोलशास्त्र, स्थापत्य और वैदिक विद्वत्ता के साथ जोड़ा।

प्रमुख बिंदु:

  1. जयपुर नगर (1727 ई.): वास्तु-आधारित ग्रिड पर वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य द्वारा नियोजित; 9 क्षेत्र (चौकड़ियाँ); सड़कें 33–111 फुट चौड़ी — आधुनिक काल का भारत का पहला उद्देश्य-निर्मित नियोजित नगर।

  2. जंतर मंतर (1724–1737 ई.): 5 चिनाई वेधशालाएँ बनाईं (दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, वाराणसी, मथुरा)। जयपुर का सम्राट यंत्र — 27 मीटर ऊँची विश्व की सबसे बड़ी धूपघड़ी — 2 सेकंड की सटीकता से सौर समय मापती है। जयपुर वेधशाला: UNESCO विश्व धरोहर (2010)।

  3. खगोलीय विद्वत्ता: ज़ीज-ए-मुहम्मद शाही (1738 ई.) लिखा, जिसमें उलुग बेग की 15वीं शताब्दी की सारणियाँ और ला हायर की यूरोपीय सारणियाँ दोनों संशोधित कीं; जयपुर में अंतरराष्ट्रीय खगोलीय सम्मेलन आयोजित किया।

  4. धार्मिक सुधार: किसी भारतीय शासक द्वारा अंतिम अश्वमेध यज्ञ (1734 ई.) सम्पन्न करवाया; राजपूतों में बहुविवाह सुधार का प्रयास किया।

निष्कर्ष: जय सिंह द्वितीय औपनिवेशिक युग की दहलीज़ पर राजपूत राजनीतिक सत्ता और वैज्ञानिक बुद्धिवाद के दुर्लभ संश्लेषण का प्रतिनिधित्व करते हैं, जब अधिकांश राजपूत दरबार मराठा और ब्रिटिश शक्ति के समक्ष पिछड़ रहे थे।