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राजस्थान की लघुचित्र शैलियाँ
राजस्थान की चित्रकला परम्पराओं को सामूहिक रूप से राजपूत चित्रकला कहा जाता है। ये मुगल दरबारी शैली से भिन्न हैं, यद्यपि लगभग 1600 ई. के बाद दोनों ने एक-दूसरे को प्रभावित किया। प्रत्येक प्रमुख राजपूत दरबार ने एक पहचानने योग्य शैली विकसित की:
| शैली | केंद्र | काल | विशेषताएँ | प्रमुख कृतियाँ |
|---|---|---|---|---|
| मेवाड़ | चित्तौड़गढ़/उदयपुर | लगभग 1260–1850 ई. | प्राचीनतम शैली; स्पष्ट रेखाएँ, सपाट रंग, राजस्थानी चेहरे; प्रकृति पृष्ठभूमि में | श्रावक-प्रतिक्रमण-सूत्र (1260 ई. पांडुलिपि), रागमाला श्रृंखला |
| मारवाड़ | जोधपुर, नागौर | लगभग 1600–1850 ई. | गहरे लाल और पीले रंग; दीर्घाकार घोड़े; ढोला-मारू प्रेम विषय | ढोला-मारू चित्र, रसिकप्रिया |
| आमेर-जयपुर | आमेर, जयपुर | लगभग 1600–1850 ई. | मुगल सूक्ष्मता से प्रभावित; चित्रण प्रधान; परवर्ती गुलाबी/पीला रंग | बिहारी सतसई चित्रण |
| बूँदी | बूँदी | लगभग 1600–1750 ई. | नील-पन्ना रंग; घने वन परिदृश्य; गीतात्मक प्रकृति दृश्य | रसमंजरी, चित्रशाला के रागमाला भित्ति-चित्र |
| कोटा | कोटा | लगभग 1625–1850 ई. | शिकार दृश्यों के लिए प्रसिद्ध; सजीव क्रिया; बूँदी शैली से विकसित | कोटा शिकार-दृश्य पांडुलिपियाँ |
| बीकानेर | बीकानेर | लगभग 1600–1850 ई. | मुगल प्रभाव सर्वाधिक; बारीक तूलिका-कार्य; ठंडा नीला-धूसर रंग | बारमासा श्रृंखला |
| किशनगढ़ | किशनगढ़ | लगभग 1720–1850 ई. | विशिष्ट लम्बे नेत्र; बानी ठनी ("भारतीय मोनालिसा") से जुड़ी | बानी ठनी चित्र (लगभग 1750 ई.) |
स्रोत: ASI; राजस्थान राज्य अभिलेखागार; डब्ल्यू.जी. आर्चर, इंडियन पेंटिंग्स फ्रॉम द पंजाब हिल्स (1973)
किशनगढ़ शैली
यद्यपि इसका चरमोत्कर्ष 18वीं शताब्दी के पश्चात् हुआ, दरबारी चित्रकार निहाल चंद (महाराजा सावंत सिंह, 1748–1757 ई. के काल में) ने प्रतिष्ठित बानी ठनी चित्र बनाया — एक ऐसी नारी जिसकी आँखें धनुष की तरह वक्राकार हैं, जो गोपी राधा का प्रतिनिधित्व करती है। यह चित्र 1973 के भारतीय डाक टिकट पर पुनर्मुद्रित हुआ और राजस्थान की चित्रकला परम्परा की सर्वाधिक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचानी जाने वाली कृति है।
