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मेवाड़ के गुहिल और सिसोदिया
बप्पा रावल और मेवाड़ की संप्रभुता की नींव
बप्पा रावल (लगभग 713–753 ई.) मेवाड़ की स्थायी संप्रभुता के ऐतिहासिक-पौराणिक संस्थापक हैं। उन्हें निम्नलिखित का श्रेय दिया जाता है:
- सिंध की विजय (712 ई.) के बाद राजस्थान में घुसे अरब आक्रमणकारियों को पराजित करना — संभवतः नागदा (राजसमंद) के निकट या गुर्जर-प्रतिहार शासकों के साथ मिलकर
- कैलाशपुरी (उदयपुर के निकट) में एकलिंगजी मंदिर परिसर की स्थापना करना, मेवाड़ के शासकों को शिव का "दीवान" (प्रबंधक) घोषित करना — यह अनुष्ठान पहचान 1,300 वर्षों तक बनी रही
- चित्तौड़गढ़ दुर्ग (परम्परागत रूप से मोरी राजपूतों के अधीन) प्राप्त करना — यद्यपि इसकी सटीक परिस्थितियाँ अभी भी विवादित हैं
गुहिल वंश, जिसका नेतृत्व बप्पा रावल ने किया, राजस्थान की सबसे पुरानी निरंतर वंश-परम्पराओं में से एक है। सिसोदिया, जो 1326 ई. में सत्तारूढ़ हुए, उसी गुहिल कुल की एक शाखा हैं।
राणा कुम्भा (1433–1468 ई.): स्थपति-राजा
राणा कुम्भा (1433–1468 ई.) को RPSC के संयुक्त राजनीतिक-सांस्कृतिक मानक से मध्यकालीन राजस्थान का सर्वश्रेष्ठ शासक माना जाता है। वे एक साथ सैन्य कमांडर, दुर्ग-निर्माता, संगीत-सिद्धांतकार और साहित्यिक संरक्षक थे।
राजनीतिक उपलब्धियाँ:
- सारंगपुर युद्ध (1437 ई.) में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी को पराजित किया — मेवाड़ के पश्चिमी और दक्षिणी किनारों को सुरक्षित किया
- नागौर के कुतुब शाह को पराजित कर नागौर को मेवाड़ में मिलाया
- अपने शासन के चरम पर राजस्थान के 100 से अधिक मध्यकालीन दुर्गों में से 84 पर नियंत्रण रखा
सैन्य स्थापत्य — 32 दुर्ग:
| दुर्ग | जिला | महत्त्व |
|---|---|---|
| कुम्भलगढ़ | राजसमंद | 36 किमी परकोटा दीवार; UNESCO विश्व धरोहर (2013) |
| अचलगढ़ | सिरोही (माउंट आबू) | विद्यमान परमार दुर्ग का जीर्णोद्धार |
| मछींद्रा | राजसमंद | पश्चिमी मेवाड़ की रणनीतिक सुरक्षा |
| चित्तौड़गढ़ परिवर्धन | चित्तौड़गढ़ | राणा कुम्भा महल, कुम्भा श्याम मंदिर जोड़े |
स्रोत: आर.वी. सोमानी, हिस्ट्री ऑफ मेवाड़ (1976); ASI दुर्ग सर्वेक्षण रिपोर्ट
कुम्भलगढ़ दुर्ग उनके 32 दुर्गों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। इसकी परकोटा दीवार — भारत की महान दीवार — अरावली पर्वत श्रृंखला के किनारे 36 किमी तक फैली है, जो लम्बाई में केवल चीन की महान दीवार से छोटी है। 7 मीटर चौड़ी चोटी पर 8 घोड़े एक साथ चल सकते हैं। इस दुर्ग में 360 मंदिर हैं और यह UNESCO विश्व धरोहर स्थल (2013) है।
सांस्कृतिक एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ:
- 4 वैदिक टीकाएँ लिखीं: चम्पू रामायण, रामाभिषेक, सुदाप्रबंध, और जयदेव के गीत-गोविंद पर टीका
- संगीत-राज लिखा — 5 पुस्तकों (पाठ रत्न, गीत रत्न, वाद्य रत्न, नृत्य रत्न, रस रत्न) में एक व्यापक संगीतशास्त्र ग्रंथ; RPSC PYQ में किसी भी राजपूत शासक की सर्वाधिक उद्धृत सांस्कृतिक उपलब्धि
- संगीत-मीमांसा और कामराज-रतिसार (कामशास्त्र परम्परा में एक काव्य) भी लिखे
- चित्तौड़गढ़ में विजय स्तम्भ (1448 ई.) का संरक्षण किया — 157 शिल्प-पट्टिकाओं वाला 9 मंजिला, 37 मीटर ऊँचा बलुआ पत्थर का स्तम्भ; राजस्थान के राज्य-प्रतीक पर अंकित
- कीर्ति स्तम्भ (12वीं शताब्दी का जैन कीर्ति स्तम्भ, उनके निर्देशन में जीर्णोद्धारित) का भी संरक्षण किया
राणा साँगा (1508–1528 ई.): अंतिम महान राजपूत संघ
राणा संग्राम सिंह ("साँगा") ने अभूतपूर्व पैमाने का अखिल-राजपूत संघ बनाया: मेवाड़, आमेर, मारवाड़, चंदेरी से 1,00,000 घुड़सवार और पैदल सैनिक तथा 7 अफगान सरदार जो इब्राहिम लोदी से विमुख हो गए थे। उनके शरीर पर 80 घाव थे; पहले के युद्धों में एक भुजा और एक आँख खो चुके थे — 25 वर्षों के निरंतर संघर्ष का प्रमाण।
खानवा का युद्ध (16 मार्च 1527 ई.)
आगरा से 37 किमी पश्चिम में लड़ा गया यह युद्ध राजपूत संघ के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। बाबर की तिमुरिद तोपखाने और तुलुगमा (पार्श्व घुड़सवार रणनीति) ने साँगा की सेना को परास्त किया। राणा साँगा जीवित बचे किंतु सैन्य दृष्टि से कभी उबर न सके। फरवरी 1528 ई. में उनकी मृत्यु हो गई — संभवतः बसवा, दौसा में एक नए अभियान की योजना के दौरान उन्हीं के सामंतों द्वारा विषप्रयोग से। खानवा ने मुगल रणनीतिक श्रेष्ठता की पुष्टि की और उत्तर भारत में राजपूत राजनीतिक वर्चस्व की अंतिम यथार्थपूर्ण सम्भावना समाप्त कर दी।
महाराणा प्रताप (1572–1597 ई.): मेवाड़ के प्रतिरोध के मूर्त रूप
महाराणा प्रताप उदय सिंह द्वितीय (जिन्होंने 1559 ई. में उदयपुर की स्थापना की थी और अकबर के 1568 के आक्रमण के दौरान चित्तौड़गढ़ से भाग गए थे) के उत्तराधिकारी बने। प्रताप ने अकेले उस समर्पण को अस्वीकार किया जो अन्य सभी प्रमुख राजपूत घरानों ने स्वीकार कर लिया था।
हल्दीघाटी का युद्ध (18 जून 1576 ई.)
खमनोर (राजसमंद जिला) के निकट एक संकरे दर्रे में लड़े गए इस युद्ध में आमने-सामने थे:
- प्रताप की ~20,000 की सेना (अफगान सरदार हाकिम खान सूर और भील तीरंदाज सहित)
- आमेर के मान सिंह I के नेतृत्व में अकबर की ~80,000 की सेना
प्रताप का प्रसिद्ध घोड़ा चेतक, युद्ध में घायल होने के बावजूद प्रताप को सुरक्षित स्थान तक ले गया और फिर उसने दम तोड़ दिया। युद्ध सामरिक रूप से अनिर्णायक रहा — मान सिंह ने मैदान जीता किंतु प्रताप को पकड़ न सका। अकबर ने कभी स्वयं प्रताप के विरुद्ध अभियान नहीं चलाया।
छापामार प्रतिरोध (1576–1597 ई.)
प्रताप अरावली और भील क्षेत्र में पीछे हट गए। भील सरदार राणा पूंजा ने महत्त्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया। 1585 ई. तक उन्होंने अधिकांश पश्चिमी मेवाड़ पुनः प्राप्त कर लिया; 1597 ई. तक चित्तौड़गढ़, मांडलगढ़ और अजमेर को छोड़कर प्रत्येक प्रमुख दुर्ग मेवाड़ के अधीन आ गया। उन्होंने चावंड (डूंगरपुर जिला) में अपनी राजधानी पुनर्स्थापित की और 19 जनवरी 1597 ई. को शिकार की चोट से 56 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हुई।
सांस्कृतिक योगदान
प्रताप ने चावंड में मेवाड़ चित्र-शैली को संरक्षण दिया। रसिकप्रिया पांडुलिपि के चित्र (लगभग 1594 ई.) मेवाड़ शैली के प्राचीनतम दिनांकित उदाहरणों में से हैं।
