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इतिहास

मध्यपाषाण काल: शिकारी-संग्राहक से पशुपालन की ओर

प्रागैतिहासिक संस्कृति एवं प्राचीन ऐतिहासिक स्थल

पेपर I · इकाई 1 अनुभाग 4 / 14 0 PYQ 42 मिनट

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मध्यपाषाण काल: शिकारी-संग्राहक से पशुपालन की ओर

मध्यपाषाण काल की विशेषताएँ

राजस्थान में मध्यपाषाण काल (Mesolithic period, लगभग 10,000–3000 ईसा पूर्व) की पहचान इन विशेषताओं से होती है:

  • सूक्ष्म पाषाण उपकरण (microlithic tools): चर्ट और कैल्सेडनी से बनी छोटी ज्यामितीय फलकें (त्रिभुज, अर्धचंद्र, समलम्ब) जो संयुक्त हथियारों में जड़ी जाती थीं
  • बड़े शिकार से छोटे पशुओं और मिश्रित खाद्य स्रोतों की ओर परिवर्तन
  • चुनिंदा स्थलों पर प्रारम्भिक पशु-पालन के साक्ष्य
  • शैल-चित्र निर्माण

बागोर: राजस्थान का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मध्यपाषाण स्थल

कोठारी नदी पर स्थित बागोर (Bagore, भीलवाड़ा जिला) राजस्थान का सर्वाधिक प्रलेखित मध्यपाषाण स्थल है और भारतीय उपमहाद्वीप के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थलों में से एक। वी.एन. मिश्रा (डेक्कन कॉलेज, पुणे) द्वारा 1967–70 में उत्खनित, बागोर ने एक स्तरीकृत अनुक्रम प्रकट किया जिसने मध्यपाषाण–ताम्रपाषाण संक्रमण की समझ को रूपांतरित कर दिया।

बागोर के तीन बसावट चरण

  • चरण I (लगभग 5000–2800 ईसा पूर्व): सूक्ष्म पाषाण उद्योग; पशु-पालन (गाय) के प्राचीनतम साक्ष्य; मृद्भांड अनुपस्थित
  • चरण II (लगभग 2800–600 ईसा पूर्व): सूक्ष्म पाषाण उपकरणों के साथ हस्तनिर्मित मृद्भांड; भेड़ और बकरी पालन जुड़ा; तांबे की छोटी वस्तुएँ (अंतिम चरण में)
  • चरण III (लगभग 600 ईसा पूर्व–200 ईस्वी): चक्र-निर्मित मृद्भांडों के साथ लोहा-उपयोग चरण

बागोर में पशु-पालन

बागोर के जीवाश्म अवशेषों में पालतू गाय (Bos indicus), भेड़ (Ovis), और बकरी (Capra) शामिल हैं — उपमहाद्वीप में प्राचीनतम ऐसे साक्ष्यों में से एक। जंगली प्रजातियाँ (नीलगाय, हिरण, जंगली सूअर) भी अस्थि-संग्रह में मौजूद हैं, जो एक मिश्रित शिकार-पशुपालन अर्थव्यवस्था की पुष्टि करती हैं।

पैमाना और महत्त्व

स्थल का टीला लगभग 5.5 मीटर गहरा है और लगभग 2 हेक्टेयर में फैला है — जो दीर्घकालीन, पर्याप्त बसावट का संकेत देता है। बागोर प्रत्यक्ष रूप से दर्शाता है कि राजस्थान दक्षिण एशियाई प्रागैतिहासिक काल में एक सीमांत क्षेत्र नहीं था, बल्कि खाद्य उत्पादन में संक्रमण का एक प्राथमिक क्षेत्र था। मिश्रा का 1967–70 का क्षेत्रकार्य एक मानक परीक्षा डेटा बिंदु है।

तिलवाड़ा (बाड़मेर जिला)

बाड़मेर जिले में लूनी नदी पर स्थित तिलवाड़ा (Tilwara) दूसरा प्रमुख मध्यपाषाण स्थल है। बी.वी. उपाध्याय द्वारा उत्खनन (1962–63) में अर्ध-शुष्क संदर्भ में सूक्ष्म पाषाण उपकरण प्राप्त हुए। तिलवाड़ा के चरण I का संग्रह पूर्णतः सूक्ष्म पाषाणकालीन है; बाद के चरणों में मृद्भांड और संभावित प्रारम्भिक पशुपालन दिखता है। यह स्थल पुष्टि करता है कि मध्यपाषाण बसावट केवल बनास घाटी तक सीमित नहीं थी, बल्कि पश्चिमी मरुस्थलीय क्षेत्र तक विस्तृत थी।

मध्यपाषाण काल के शैल-चित्र

राजस्थान की शैल-चित्र (rock art) परम्परा मुख्यतः मध्यपाषाण–प्रारम्भिक ताम्रपाषाण चरण (लगभग 8000–2000 ईसा पूर्व) से संबंधित है। प्रमुख स्थलों में शामिल हैं:

  • कन्यादेह (बारां जिला): लाल गेरू में पशु आकृतियाँ (हिरण, बाइसन, घोड़े) और शिकार दृश्य; शैली मध्य प्रदेश की भीमबेटका परम्परा से मिलती है
  • दर्रा (कोटा जिला): ज्यामितीय आकृतियाँ और पशु रूप; आंशिक रूप से ताम्रपाषाण सामग्री से अतिच्छादित
  • चम्बल घाटी स्थल (कोटा–बारां): पूर्वी राजस्थान में शैल-चित्रों का सबसे बड़ा संकेंद्रण; हस्त-छाप, मानवाकृतियाँ और अमूर्त आकृतियाँ

ये स्थल राजस्थान की प्रागैतिहासिक जनसंख्या में प्रतीकात्मक और संज्ञानात्मक क्षमता का प्रलेखन करते हैं और पुरातात्त्विक रूप से वी.एस. वाकणकर द्वारा अध्ययन किए गए व्यापक मध्य भारतीय शैल-चित्र प्रांत से जुड़े हैं।