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इतिहास

कालीबंगा: राजस्थान की हड़प्पाई नगर-सभ्यता

प्रागैतिहासिक संस्कृति एवं प्राचीन ऐतिहासिक स्थल

पेपर I · इकाई 1 अनुभाग 6 / 14 0 PYQ 42 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

कालीबंगा: राजस्थान की हड़प्पाई नगर-सभ्यता

खोज एवं उत्खनन

कालीबंगा (शाब्दिक अर्थ: "काली चूड़ियाँ" — स्थानीय राजस्थानी बोली में, सतह पर मिली काली मिट्टी की चूड़ियों के आधार पर) हनुमानगढ़ जिले में हरियाणा सीमा के निकट प्राचीन घग्गर नदी (वर्तमान में एक सूखी मौसमी नदी-तल) के बाएँ किनारे पर स्थित है।

  • प्रथम पहचान: ए. घोष (महानिदेशक, ASI) ने 1952 में व्यवस्थित सतही सर्वेक्षण के दौरान
  • उत्खनन: बी.बी. लाल और बी.के. थापर (ASI), 1961–69 — राजस्थान के किसी भी प्रागैतिहासिक स्थल का सर्वाधिक व्यापक उत्खनन
  • स्थल विस्तार: लगभग 300 × 120 मीटर (निचला नगर) + 240 × 120 मीटर (गढ़ी टीला); अधिकांश स्थल अभी भी अनुत्खनित

बसावट के दो चरण

कालीबंगा की स्तरिकी दो विशिष्ट सांस्कृतिक चरण दर्शाती है:

पूर्व-हड़प्पाई चरण (लगभग 2900–2550 ईसा पूर्व)

  • अनियमित विन्यास में मिट्टी की ईंटों के घर
  • ज्यामितीय डिज़ाइन वाले हस्तनिर्मित मृद्भांड
  • विश्व का प्राचीनतम जुता हुआ खेत (लगभग 2800 ईसा पूर्व): बस्ती के दक्षिण में एक खेत में हल-रेखाओं की जाली दिखती है — कुछ उत्तर-पूर्व-दक्षिण-पश्चिम और कुछ दक्षिण-पूर्व-उत्तर-पश्चिम दिशा में — हड़प्पाई निक्षेपों के नीचे संरक्षित। यह क्रॉस-हल प्रतिरूप आज भी इस क्षेत्र में प्रचलित दोहरी जुताई से मिलता है। यह विश्व में कहीं भी जुताई कृषि का प्राचीनतम प्रत्यक्ष साक्ष्य है।
  • लिपि, मानकीकृत बाट-माप का अभाव

परिपक्व हड़प्पाई चरण (लगभग 2550–1900 ईसा पूर्व)

बस्ती का पुनर्गठन हड़प्पाई नगरीय योजना के अनुरूप दो विशिष्ट क्षेत्रों में हुआ:

विशेषता कालीबंगा मोहनजोदड़ो / हड़प्पा
गढ़ी किलेबंदी हाँ — मिट्टी की ईंट हाँ
निचले नगर की किलेबंदी हाँ — कालीबंगा की विशिष्टता नहीं
गढ़ी पर अग्नि-वेदिकाएँ हाँ — 5–6 मंच, अग्नि-कुंड सहित अनुपस्थित
महास्नानागार समतुल्य कोई नहीं मिला मोहनजोदड़ो में उपस्थित
निचले नगर में सड़क जाल हाँ हाँ
नालियाँ हाँ हाँ
पकी ईंट हाँ (हड़प्पाई चरण) हाँ
जुते हुए खेत का साक्ष्य पूर्व-हड़प्पाई जुता हुआ खेत अनुपस्थित
मुहर-लिपि हाँ (हड़प्पाई लिपि) हाँ

स्रोत: बी.बी. लाल, "The Earliest Civilization of South Asia," 1997; ASI वार्षिक रिपोर्ट 1961–69

कालीबंगा की अद्वितीय नैदानिक विशेषताएँ

  1. द्विकालिक किलेबंदी: गढ़ी (पश्चिमी टीला) और निचले नगर (पूर्वी टीला) दोनों को मिट्टी की ईंट की दीवारों से स्वतंत्र रूप से किलेबंद किया गया था। यह हड़प्पाई संसार में कहीं नहीं मिलती — मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, धोलावीरा या राखीगढ़ी में भी नहीं।

  2. अग्नि-वेदिकाएँ: कालीबंगा की गढ़ी में 5–6 ईंट-मंचों की एक पंक्ति है, जिनमें से प्रत्येक में एक अग्नि-कुंड (कुछ में पशु-हड्डियाँ और राख सहित) है। इन्हें अनुष्ठान-अग्नि-वेदिकाएँ माना जाता है। हड़प्पाकालीन गढ़ी में इनकी उपस्थिति को हड़प्पाई अनुष्ठान-परंपरा को बाद की वैदिक अग्निहोत्र परंपरा से जोड़ने के साक्ष्य के रूप में उद्धृत किया जाता है — हालाँकि यह व्याख्या शैक्षणिक वर्गों में विवादित है।

  3. महास्नानागार का अभाव: मोहनजोदड़ो (महास्नानागार के लिए प्रसिद्ध) के विपरीत, कालीबंगा में कोई बड़ा सामूहिक स्नानागार नहीं मिला, यद्यपि घरों में ईंट के फर्श और नालियों वाले व्यक्तिगत स्नानागार मिले।

  4. हड़प्पाई लिपि की मुहरें: हड़प्पाई लिपि उत्कीर्ण मानक मुहरें और मुद्रांकन पुष्टि करते हैं कि कालीबंगा पूरी तरह साक्षर हड़प्पाई नगरीय नेटवर्क का हिस्सा था।

  5. पूर्व-हड़प्पाई जुता हुआ खेत: परिपक्व हड़प्पाई निक्षेपों के नीचे संरक्षित यह खेत भौगोलिक रूप से लगभग 2800 ईसा पूर्व का है — राजस्थान से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वाधिक उद्धृत पुरातात्त्विक निष्कर्ष।

परित्याग

कालीबंगा लगभग 1900 ईसा पूर्व परित्यक्त हुआ, जो अन्य परिपक्व हड़प्पाई नगरों के पतन के समकालीन है। सर्वाधिक स्वीकृत व्याख्या है कि घग्गर-हाकरा नदी (प्राचीन सरस्वती) का सूख जाना, जिसने नगर को जीवित रखने वाली कृषि-जल-आपूर्ति समाप्त कर दी।