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ताम्रपाषाण संस्कृतियाँ
अवलोकन
राजस्थान में ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic period, लगभग 3000–1000 ईसा पूर्व) असाधारण रूप से समृद्ध है, जिसने दो विशिष्ट क्षेत्रीय संस्कृतियाँ — अहाड़-बनास परिसर और गणेश्वर-जोधपुरा परिसर — तथा उत्तर-पश्चिम की समकालीन हड़प्पा सभ्यता के साथ महत्त्वपूर्ण अंतर्क्रिया उत्पन्न की।
4A. अहाड़-बनास संस्कृति
अहाड़-बनास संस्कृति (Ahar-Banas Culture, लगभग 2800–1500 ईसा पूर्व) दक्षिण-पूर्वी राजस्थान की प्राथमिक ताम्रपाषाण सांस्कृतिक इकाई है, जो बनास और बेड़च नदी घाटियों पर केंद्रित है। उदयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, राजसमंद और टोंक जिलों में 90 से अधिक स्थलों की पहचान की गई है।
उत्खनन इतिहास
- अहाड़ (उदयपुर): सर्वप्रथम आर.सी. अग्रवाल (1953–54) द्वारा उत्खनित, तत्पश्चात् एच.डी. संकालिया, एस.आर. राव और वी.एन. मिश्रा ने बाद के सत्रों में। इस प्ररूप-स्थल से संस्कृति को अपना नाम मिला; बस्ती के टीले को स्थानीय भाषा में धूलकोट (Dhulkot) कहा जाता है।
- गिलुंड (राजसमंद): डेक्कन कॉलेज द्वारा उत्खनित; संस्कृति के पूर्वी विस्तार की पुष्टि करता है और मिट्टी की ईंटों की वास्तुकला प्रकट करता है।
- बालाथल (उदयपुर): हाल के उत्खनन (1993–2006) में वी.एस. शिंदे ने तांबा-गलाने की भट्टियाँ उजागर कीं, जो अहाड़-बनास बस्ती के भीतर तांबा धातुकर्म का प्रथम प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रदान करती हैं।
भौतिक संस्कृति — नैदानिक विशेषताएँ
- काले-लाल मृद्भांड (Black-and-red ware): अहाड़-बनास की विशिष्ट मृद्भांड पहचान — एक विशिष्ट कुम्भकारी जिसमें बाहरी सतह काली और आंतरिक सतह लाल होती है, जो एक विशेष विपर्यय पकाने की तकनीक से उत्पादित होती है। यह मृद्भांड सभी 90+ स्थलों पर मिलता है और प्राथमिक नैदानिक चिह्नक है।
- तांबे के उपकरण: चपटी कुल्हाड़ियाँ, चूड़ियाँ, छेनी, अँगूठियाँ — केवल तांबा (कांसा नहीं)। तांबा स्थानीय रूप से खेत्री और जावर खानों से उपलब्ध था।
- आवास: मिट्टी की ईंटों की संरचनाएँ (अंतिम चरण तक पकी ईंटें अनुपस्थित); गिलुंड और बालाथल में बहु-कक्ष आयताकार घर।
- अर्थव्यवस्था: मिश्रित कृषि-पशुपालन आधार — गेहूँ, जौ, बाजरा; गाय, भेड़, बकरी; शिकार से पूरक।
- शवाधान: बस्ती क्षेत्रों में विस्तारित दफन (अहाड़ में घर के फर्शों के नीचे), मृद्भांड और आभूषणों सहित शवोपकरणों के साथ।
हड़प्पा सभ्यता से तुलना
उत्तर-पश्चिम की समकालीन हड़प्पा सभ्यता के विपरीत, अहाड़-बनास समुदायों में न लिपि थी, न मानकीकृत बाट-माप, न ग्रिड-योजना बस्ती, और न हड़प्पाई पैमाने के दूरगामी व्यापार नेटवर्क। ये एक विकसित ग्राम-आधारित ताम्रपाषाण समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, नगरीय सभ्यता का नहीं।
RPSC के लिए अहाड़-बनास का महत्त्व: 2018 की मेन्स परीक्षा में सीधे "राजस्थान की अहाड़ संस्कृति की मुख्य विशेषताएँ" (10 अंक) पूछा गया। 2026 में ताम्रपाषाण राजस्थान पर कोई भी प्रश्न काले-लाल मृद्भांड, तांबा प्रौद्योगिकी, बनास घाटी वितरण, और स्थल उत्खनन इतिहास में दक्षता की अपेक्षा रखेगा।
4B. गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति (तांबा-संग्रह परिसर)
गणेश्वर (Ganeshwar, नीम का थाना, सीकर जिला) राजस्थान का सबसे उल्लेखनीय ताम्रपाषाण स्थल है, जिसे आर.सी. अग्रवाल और वी. कुमार (1977–84) ने उत्खनित किया। तांबा-समृद्ध खेत्री क्षेत्र के निकट स्थित, गणेश्वर से प्राप्त हुए:
- एक ही स्थल से 900 से अधिक तांबे के उपकरण: तीर (सबसे बड़ी श्रेणी), भाले, मछली के काँटे, चपटे कुल्हाड़े, चूड़ियाँ, अँगूठियाँ और सुइयाँ
- तांबे के साथ सूक्ष्म पाषाण चकमक उपकरण — एक ताम्रपाषाण संक्रमणकालीन संग्रह
- तांबा-संग्रहों से जुड़े गेरू-रंग मृद्भांड (OCP)
- C-14 तिथियाँ: लगभग 2800–2200 ईसा पूर्व (पूर्व-हड़प्पाई से प्रारम्भिक हड़प्पाई समकालीनता)
गणेश्वर का महत्त्व
तांबे की वस्तुओं की विशाल संख्या (एक स्थल से 900+) और उनकी मानकीकृत प्ररूपविज्ञान से पता चलता है कि गणेश्वर तांबे के उपकरणों का एक उत्पादन और वितरण केंद्र था। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के हड़प्पाई तांबे की वस्तुओं के रासायनिक विश्लेषण से अयस्क-स्रोत चिह्न खेत्री तांबा पट्टी के अनुरूप हैं — जो दृढ़ता से सुझाता है कि गणेश्वर-क्षेत्र का तांबा हड़प्पाई नगरों को निर्यात किया जाता था।
इस प्रकार गणेश्वर एक तकनीकी रूप से उन्नत किंतु पुरातात्त्विक रूप से गैर-नगरीय ताम्रपाषाण समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है जिसने तांबा व्यापार के माध्यम से हड़प्पाई नगरीय अर्थव्यवस्था की सेवा की। "ताम्रपाषाण भारत की तांबे की राजधानी" (पुरातात्त्विक साहित्य में गढ़ा गया) एक मानक परीक्षा शब्दावली है।
जोधपुरा (जोधपुर शहर नहीं — यह जयपुर जिले में एक अलग ग्राम-स्थल है) इस संस्कृति का सहयोगी स्थल है, जिससे समान OCP मृद्भांड और तांबे की वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं, जो पुष्टि करती हैं कि संस्कृति सीकर से दक्षिण में ढूंढ घाटी तक विस्तृत थी।
