सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन
मुख्य बिंदु
भारत में उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु है जिसमें चार स्पष्ट ऋतुएँ हैं: शीत ऋतु (दिसम्बर–फरवरी), पूर्व-मानसून/गर्म-शुष्क ग्रीष्म (मार्च–मई), दक्षिण-पश्चिमी मानसून (जून–सितम्बर), और लौटता मानसून/उत्तर-पूर्वी मानसून (अक्टूबर–नवम्बर)।
दक्षिण-पश्चिमी मानसून का उद्गम अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) से होता है जो जून में भारत के ऊपर उत्तर की ओर खिसकता है; यह अरब सागर शाखा (पहले पश्चिमी घाट से टकराती है; पश्चिमी भारत में 80% वर्षा लाती है) और बंगाल की खाड़ी शाखा (पहले पूर्वोत्तर भारत/बांग्लादेश प्रवेश करती है; गंगा मैदान में वर्षा लाती है) में विभाजित होता है।
मावसिनराम (मेघालय) को विश्व की सर्वाधिक वार्षिक वर्षा — 11,871 mm (चेरापूँजी/सोहरा: 11,777 mm) प्राप्त होती है; दोनों खासी पहाड़ियों की कीप-आकार घाटी में हैं। जैसलमेर (राजस्थान) में भारत की सबसे कम वर्षा होती है — ~150 mm प्रतिवर्ष।
El Niño — मध्य/पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का असामान्य गर्म होना (हर 3–7 वर्ष) — Walker Circulation को कमज़ोर करता है, SW मानसून को दबाता है जिससे भारत में सामान्य से कम वर्षा होती है (सूखे का खतरा)। La Niña (प्रशांत का ठंडा होना) सामान्यतः SW मानसून को सशक्त करता है जिससे अतिरिक्त वर्षा होती है।
पश्चिमी विक्षोभ (WDs) मध्य-अक्षांशीय चक्रवाती मौसम प्रणालियाँ हैं जो भूमध्यसागर/अटलांटिक से उत्पन्न होकर उपोष्णकटिबंधीय जेट स्ट्रीम के साथ पूर्व की ओर चलती हैं और उत्तर-पश्चिम भारत (पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड, J&K) में शीतकालीन वर्षा लाती हैं। ये दिसम्बर–फरवरी में प्रतिमाह 5–10 वर्षा के दिन उत्पन्न करती हैं।
तिब्बती पठार मानसून को चलाने वाले तापीय इंजन की भूमिका निभाता है — गर्मियों में पठार (औसत 4,500 m) तेज़ी से गर्म होता है जिससे ऊपरी वायुमंडल में एक शक्तिशाली उच्च-दाब ऊष्मा स्रोत बनता है; यह ऊर्जा ऊपरी-स्तरीय प्रतिचक्रवात को सशक्त करती है और मानसून की अरब सागर शाखा को तीव्र करती है।
भारत की औसत वार्षिक वर्षा लगभग 1,187 mm है — परन्तु वितरण अत्यंत असमान है: उत्तर-पूर्व और पश्चिमी घाट के सम्मुख भागों में >2,000 mm; थार मरुस्थल और वृष्टिछाया दक्कन में <250 mm; और गांगेय मैदानों में 600–1,200 mm।
मानसून का आगमन और वापसी: SW मानसून सामान्यतः केरल (तिरुवनंतपुरम) में 1 जून ± 7 दिन को पहुँचता है; 27 जून–5 जुलाई तक दिल्ली पहुँचता है; 15 जुलाई तक पूरे भारत को ढक लेता है; सितम्बर में उत्तर-पश्चिम भारत से वापसी शुरू होती है; 1 दिसम्बर तक पूर्णतः वापस हो जाता है (NE मानसून की जगह लेता है)।
उत्तर-पूर्वी मानसून (NE Monsoon) — अक्टूबर–दिसम्बर; स्थल (उच्च दाब) से बंगाल की खाड़ी की ओर शीतकालीन पवनों का विपरीत प्रवाह; तमिलनाडु, दक्षिणी AP, और श्रीलंका में वर्षा लाता है; तमिलनाडु को अपनी 60% वार्षिक वर्षा NE मानसून से मिलती है। चेन्नई में सर्वाधिक वर्षा अक्टूबर–दिसम्बर (NE मानसून) में होती है, SW मानसून में नहीं।
भारत के लिए Koppen जलवायु वर्गीकरण: उष्णकटिबंधीय मानसून (Am — अधिकांश भारत); उष्णकटिबंधीय सवाना (Aw — दक्कन प्रायद्वीप); अर्ध-शुष्क स्टेपी (BSh — आंतरिक दक्कन, राजस्थान); शुष्क/गर्म मरुस्थल (BWh — थार); आर्द्र उपोष्णकटिबंधीय (Cwa — गंगा मैदान); पर्वतीय (H — हिमालय, उच्च ऊँचाई)।
लू एक गर्म, शुष्क, धूलभरी हवा है जो अप्रैल–जून के दौरान इंडो-गांगेय मैदान पर चलती है, दिन का तापमान 45–50°C तक पहुँचाती है। यह राजस्थान, UP और बिहार में सबसे तेज़ होती है।
भारत में 29 कृषि-जलवायु क्षेत्र (ICAR के अनुसार) और 15 कृषि-जलवायु क्षेत्र (योजना आयोग के अनुसार) हैं; Trewartha के वर्गीकरण में 6 जलवायु प्रकार; Stamp के वर्गीकरण में 4; RPSC सामान्यतः Koppen (6 प्रकार) या सामान्य क्षेत्रीय वर्गीकरण का उपयोग करता है।
