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मुख्य बिंदु
भगवद्गीता (18 अध्याय, 700 श्लोक) कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र पर राजकुमार अर्जुन और श्रीकृष्ण के बीच संवाद है; महाभारत के भीष्म पर्व में है और उपनिषद दर्शन (वेदांत) का सार मानी जाती है।
निष्काम कर्म — फल की इच्छा के बिना कर्म — गीता की केंद्रीय नैतिक शिक्षा है (अध्याय 3, श्लोक 19); यह कर्म को अहंकार और असफलता के भय से मुक्त करता है।
स्थितप्रज्ञ (अध्याय 2, श्लोक 54–72) स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति जो सुख-दुख में समभाव रखता है; प्रशासक के लिए अर्थ: व्यक्तिगत लाभ, भय, क्रोध या चाटुकारिता से अप्रभावित निर्णय।
स्वधर्म (अध्याय 3, श्लोक 35) — अपनी भूमिका का विशिष्ट कर्तव्य; "अपना धर्म अपूर्ण हो तो भी दूसरे के धर्म से श्रेष्ठ है" — सिविल सेवक के लिए स्वधर्म है संवैधानिक कर्तव्यों का विश्वस्त निर्वहन।
लोकसंग्रह (अध्याय 3, श्लोक 20–25) — सबके कल्याण के लिए शासन; नेता व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं बल्कि समाज को संगठित रखने के लिए कार्य करता है; श्रीकृष्ण का उदाहरण: "मुझे कुछ पाना नहीं, फिर भी कार्य करता हूँ — लोक व्यवस्था बनाए रखने।"
गीता मोक्ष के तीन मार्ग प्रस्तुत करती है: ज्ञान मार्ग (विद्या/बुद्धि), भक्ति मार्ग (श्रद्धा), और कर्म मार्ग (निःस्वार्थ कर्म); प्रशासनिक दृष्टि से कर्म मार्ग सर्वाधिक प्रासंगिक।
नेतृत्व पर गीता: नेता का आचरण जनता का अनुकरण करती है (यद्यद्आचरति श्रेष्ठ:); भ्रष्ट या स्वार्थी नेता समाज का पतन कराता है — नेतृत्व में सत्यनिष्ठा व्यक्तिगत नैतिकता और शासन आवश्यकता दोनों है।
समत्वम (साम्यभाव): अध्याय 2, श्लोक 48 — "योग: समत्वम् उच्यते"; गीता सफलता-विफलता, यश-अपयश में समान प्रसन्नता का आग्रह करती है — राजनीतिक प्रशंसा और मीडिया आलोचना दोनों का सामना करने वाले सिविल सेवकों के लिए प्रत्यक्ष प्रासंगिकता।
वैराग्य बनाम उदासीनता: गीता वैराग्य (फल से अनासक्ति, कर्म की गुणवत्ता से नहीं) और उदासीनता (दायित्व से पलायन) में सुस्पष्ट अंतर करती है; कुशल प्रशासक पुरस्कार से अनासक्त किंतु कार्य की गुणवत्ता के प्रति गहरे समर्पित होता है।
समकालीन प्रासंगिकता: RPSC 2026 पाठ्यक्रम में गीता नैतिकता स्पष्ट रूप से शामिल है। उच्चतम न्यायालय, भूतपूर्व राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों ने गीता को भारत में लोक सेवा नैतिकता की आधारभूत पाठ्यपुस्तक माना है।
कर्म-पंगुता की आलोचना: आरंभ में अर्जुन का विषाद (विषाद) नैतिक पंगुता का प्रतीक है — कृष्ण का उत्तर: कर्तव्य के समक्ष अकर्म स्वयं अनैतिक है; सिविल सेवकों को नैतिक दुविधाओं को नौकरशाही जड़ता में नहीं बदलने देना चाहिए।
गीता और जाति: अंबेडकर ने वर्ण-व्यवस्था को न्यायसंगत ठहराने के लिए गीता के उपयोग की आलोचना की; किंतु कृष्ण वर्ण को गुण और कर्म पर आधारित (जन्म पर नहीं) बताते हैं — नैतिक व्याख्या गुणवत्तापरक योग्यता पर जोर देती है।
