40. जाति एवं वर्ग: अवधारणाएँ, बदलते आयाम
Caste & Class: Concepts, Changing Dimensionsमूल मुख्य बिंदु
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जाति (जाति) जन्म-आधारित, अंतर्विवाही, वंशानुगत एवं पदानुक्रमिक सामाजिक समूह है; वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) से भिन्न। भारत में ~3,000 जातियाँ और ~25,000 उपजातियाँ हैं (मानवशास्त्र सर्वेक्षण, 1985–92)।
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एम.एन. श्रीनिवास ने प्रभु जाति के चार गुण बताए (1959): संख्यात्मक शक्ति, आर्थिक शक्ति (भूमि), राजनीतिक प्रभाव, उच्च अनुष्ठानिक प्रतिष्ठा। उदाहरण: हरियाणा में जाट, गुजरात में पटेल, कर्नाटक में लिंगायत, राजस्थान में राजपूत।
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खंडात्मक विभाजन (लुई डूमॉन्त, होमो हाइरार्किकस, 1966) — जाति समाज को खंडों में बाँटती है जहाँ व्यक्ति समूह-सदस्यता, शुद्धता-अपवित्रता पदानुक्रम और व्यावसायिक अन्योन्याश्रय (जजमानी व्यवस्था) से परिभाषित होता है।
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सामाजिक वर्ग एक खुला, गैर-वंशानुगत समूह है जो आर्थिक मानदंड — आय, संपत्ति, व्यवसाय, शिक्षा — से परिभाषित होता है। मैक्स वेबर ने वर्ग (आर्थिक), स्तर (सामाजिक प्रतिष्ठा) और दल (राजनीतिक शक्ति) को तीन आयाम माना।
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संस्कृतीकरण (श्रीनिवास) — निम्न जातियाँ ऊँची जातियों (विशेषतः द्विज) के आचार, कर्मकांड, खानपान, विश्वास अपनाकर सामाजिक गतिशीलता पाती हैं। उदाहरण: UP में अहीरों द्वारा यज्ञोपवीत ग्रहण। सीमा: अनुष्ठानिक स्तर बदलता है, संरचनात्मक असमानता नहीं।
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मंडल आयोग (1978–80; 1990 में वी.पी. सिंह सरकार ने लागू किया) ने 3,743 OBC जातियाँ — जनसंख्या का अनुमानित 52% — चिह्नित कर केंद्र सरकार नौकरियों एवं शिक्षा में 27% आरक्षण की सिफारिश की। कुल: SC 15% + ST 7.5% + OBC 27% = 49.5% (इंद्रा साहनी केस, 1992 में SC द्वारा 50% सीमा)।
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जाति-वर्ग अंतर्संबंध — 1991 उदारीकरण के बाद शहरी, शिक्षित भारतीयों में वर्ग-पहचान मजबूत हुई; तथापि जाति जीवन-अवसरों का संरचनात्मक निर्धारक बनी रही। ASER और NFHS डेटा दर्शाते हैं कि SC/ST विद्यार्थियों की ड्रॉपआउट दर सामान्य वर्ग से अधिक है।
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EWS आरक्षण — 103वाँ संविधान संशोधन (जनवरी 2019) ने सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (आय ₹8 लाख/वर्ष से कम; कृषि भूमि 5 एकड़ से कम) के लिए 10% आरक्षण जोड़ा। SC ने जनहित अभियान मामले में (नवंबर 2022) 3:2 बहुमत से बरकरार रखा।
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जजमानी व्यवस्था — ग्रामीण भारत में जाति-आधारित पारंपरिक आर्थिक विनिमय तंत्र जिसमें निम्न जातियाँ (कामिन) प्रभु जाति (जजमान) को वंशानुगत सेवाएँ देती हैं और बदले में अन्न व सुरक्षा पाती हैं। डब्ल्यू.एच. वाइज़र (The Hindu Jajmani System, 1936) द्वारा चिह्नित। 1947 के बाद भूमि सुधार, मजदूरी-श्रम और बाजार अर्थव्यवस्था से यह प्रणाली काफी हद तक टूट गई।
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अंबेडकर की जाति आलोचना — जाति का विनाश (1936) में डॉ. अंबेडकर ने कहा जाति को सुधारा नहीं जा सकता, उसे नष्ट करना होगा क्योंकि वह हिंदू शास्त्र और वर्ण विचारधारा में जड़ों तक समाई है। गांधी के विपरीत, जो जाति में सुधार चाहते थे, अंबेडकर इसे श्रेणीबद्ध असमानता की व्यवस्था मानते थे। 14 अक्टूबर 1956 को 6 लाख दलितों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण एक समाजशास्त्रीय क्रांति था।
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क्रीमी लेयर — इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) में SC ने माना कि OBC में अधिक समृद्ध एवं उन्नत वर्ग ("क्रीमी लेयर") को OBC आरक्षण से बाहर रखा जाए। वर्तमान आय सीमा ₹8 लाख प्रतिवर्ष (2017 में संशोधित)। यह सिद्धांत सुनिश्चित करता है कि आरक्षण सबसे पिछड़े वर्ग तक पहुँचे।
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जाति और राजनीति — वोट बैंक गतिशीलता: भारत में जाति समूह संगठित राजनीतिक समूहों के रूप में कार्य करते हैं। CSDS-लोकनीति सर्वेक्षण लगातार दर्शाते हैं कि 60–70% भारतीय मतदाता जाति-पहचान के आधार पर मतदान करते हैं। जाति-आधारित राजनीतिक गतिशीलता ने OBC-प्रभुत्व वाले क्षेत्रीय दलों (RJD, SP, AIADMK/DMK) को जन्म दिया है।
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संभावित संभावित RAS प्रश्न
PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित
1 5M एम.एन. श्रीनिवास के अनुसार प्रभु जाति के क्या-क्या गुण हैं?
आदर्श उत्तर
एम.एन. श्रीनिवास (1959) ने प्रभु जाति के चार गुण बताए: (1) संख्यात्मक शक्ति; (2) भूमि स्वामित्व से आर्थिक वर्चस्व; (3) स्थानीय शासन में राजनीतिक प्रभाव; (4) जाति पदानुक्रम में उच्च अनुष्ठानिक प्रतिष्ठा। जब जाति सभी चारों गुण साथ रखे, तभी वह वास्तव में प्रभु होती है। उदाहरण: जाट, पटेल, राजपूत।
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